सनातन स्तोत्र संग्रह
ऋषभदेव
ऋषभदेव

॥ श्री भक्तामर स्तोत्रम्॥

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रचयिता: आचार्य श्री मानतुंग देव पाठ संख्या: 6
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भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-
मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम्।
सम्यक्-प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा-
वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम्॥ १ ॥

यः संस्तुतः सकल-वाङ् मय-तत्त्व-बोधा-
दुद्भूत-बुद्धि-पटुभिः सुर-लोक-नाथैः।
स्तोत्रैर्जगत्-त्रितय-चित्त-हरैरुदारैः,
स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥ २ ॥

बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ!
स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम्।
बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब-
मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम्॥ ३ ॥

वक्तुं गुणान्गुण-समुद्र! शशाङ्क-कान्तान्,
कस्ते क्षमः सुर-गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या।
कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-नक्र-चक्रं,
को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥ ४ ॥

सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश!
कर्तुं स्तवं विगत-शक्ति-रपि प्रवृत्तः।
प्रीत्यात्म-वीर्य-मविचार्य मृगी मृगेन्द्रम्,
नाभ्येति किं निज-शिशोः परिपालनार्थम्॥ ५ ॥

अल्प-श्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम,
त्वद्-भक्तिरेव मुखरी-कुरुते बलान्माम्।
यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति,
तच्चाम्र-चारु-कलिका-निकरैक-हेतुः॥ ६ ॥

त्वत्संस्तवेन भव-सन्तति-सन्निबद्धं,
पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम्।
आक्रान्त-लोक-मलि-नील-मशेष-माशु,
सूर्यांशु-भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम्॥ ७ ॥

मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद-
मारभ्यते तनु-धियापि तव प्रभावात्।
चेतो हरिष्यति सतां नलिनी-दलेषु,
मुक्ता-फल-द्युति-मुपैति ननूद-बिन्दुः॥ ८ ॥
आस्तां तव स्तवन-मस्त-समस्त-दोषं,
त्वत्सङ्कथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति।
दूरे सहस्रकिरणः कुरुते प्रभैव,
पद्माकरेषु जलजानि विकासभाञ्जि॥ ९ ॥

नात्यद्-भुतं भुवन-भूषण! भूत-नाथ!
भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्त-मभिष्टुवन्तः।
तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा,
भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति॥ १० ॥
दृष्ट्वा भवन्त-मनिमेष-विलोकनीयं,
नान्यत्र-तोष-मुपयाति जनस्य चक्षुः।
पीत्वा पयः शशिकर-द्युति-दुग्ध-सिन्धोः,
क्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत्॥ ११ ॥

यैः शान्त-राग-रुचिभिः परमाणुभिस्-त्वं,
निर्मापितस्-त्रि-भुवनैक-ललाम-भूत!
तावन्त एव खलु तेऽप्यणवः पृथिव्यां,
यत्ते समान-मपरं न हि रूप-मस्ति॥ १२ ॥

वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरग-नेत्र-हारि,
निःशेष-निर्जित-जगत्त्रितयोपमानम्।
बिम्बं कलङ्क-मलिनं क्व निशाकरस्य,
यद्वासरे भवति पाण्डुपलाश-कल्पम्॥ १३ ॥

सम्पूर्ण-मण्डल-शशाङ्क-कला-कलाप-
शुभ्रा गुणास्-त्रि-भुवनं तव लङ्घयन्ति।
ये संश्रितास्-त्रि-जगदीश्वरनाथ-मेकं,
कस्तान् निवारयति सञ्चरतो यथेष्टम्॥ १४ ॥

चित्रं-किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्गनाभिर्-
नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम्।
कल्पान्त-काल-मरुता चलिताचलेन,
किं मन्दराद्रिशिखरं चलितं कदाचित्॥ १५ ॥

निर्धूम-वर्ति-रपवर्जित-तैल-पूरः,
कृत्स्नं जगत्त्रय-मिदं प्रकटीकरोषि।
गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां,
दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ! जगत्प्रकाशः॥ १६ ॥

नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्यः,
स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्-जगन्ति।
नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा-प्रभावः,
सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र! लोके॥ १७ ॥

नित्योदयं दलित-मोह-महान्धकारं,
गम्यं न राहु-वदनस्य न वारिदानाम्।
विभ्राजते तव मुखाब्ज-मनल्पकान्ति,
विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशाङ्क-बिम्बम्॥ १८ ॥

किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा,
युष्मन्मुखेन्दु-दलितेषु तमःसु नाथ!
निष्पन्न-शालि-वन-शालिनी जीव-लोके,
कार्यं कियज्जल-धरै-र्जल-भार-नम्रैः॥ १९ ॥

ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं,
नैवं तथा हरि-हरादिषु नायकेषु।
तेजः स्फुरन्मणिषु याति यथा महत्त्वं,
नैवं तु काच-शकले किरणाकुलेऽपि॥ २० ॥

मन्ये वरं हरि-हरादय एव दृष्टा,
दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति।
किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यः,
कश्चिन्मनो हरति नाथ! भवान्तरेऽपि॥ २१ ॥

स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,
नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता।
सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं,
प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशु-जालम्॥ २२ ॥

त्वामामनन्ति मुनयः परमं पुमांस-
मादित्य-वर्ण-ममलं तमसः पुरस्तात्।
त्वामेव सम्य-गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं,
नान्यः शिवः शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्थाः॥ २३ ॥

त्वा-मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं,
ब्रह्माणमीश्वर-मनन्त-मनङ्ग-केतुम्।
योगीश्वरं विदित-योग-मनेक-मेकं,
ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्तः॥ २४ ॥

बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्,
त्वं शङ्करोऽसि भुवन-त्रय-शङ्करत्वात्।
धातासि धीर! शिव-मार्ग विधेर्विधानाद्,
व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि॥ २५ ॥

तुभ्यं नमस्-त्रिभुवनार्ति-हराय नाथ!
तुभ्यं नमः क्षिति-तलामल-भूषणाय।
तुभ्यं नमस्-त्रिजगतः परमेश्वराय,
तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय॥ २६ ॥

को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्-
त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश!
दोषै-रुपात्त-विविधाश्रय-जात-गर्वैः,
स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥ २७ ॥

उच्चै-रशोक-तरु-संश्रितमुन्मयूख-
माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम्।
स्पष्टोल्लसत्-किरण-मस्त-तमो-वितानं,
बिम्बं रवेरिव पयोधर-पाश्र्ववर्ति॥ २८ ॥

सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे,
विभ्राजते तव वपुः कनकावदातम्।
बिम्बं वियद्-विलस-दंशुलता-वितानं,
तुङ्गोदयाद्रि-शिरसीव सहस्र-रश्मेः॥ २९ ॥

कुन्दावदात-चल-चामर-चारु-शोभं,
विभ्राजते तव वपुः कलधौत-कान्तम्।
उद्यच्छशाङ्क-शुचिनिर्झर-वारि-धार-
मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम्॥ ३० ॥

छत्र-त्रयं तव विभाति शशाङ्क-कान्त-
मुच्चैः स्थितं स्थगित-भानु-कर-प्रतापम्।
मुक्ता-फल-प्रकर-जाल-विवृद्ध-शोभं,
प्रख्यापयत्-त्रिजगतः परमेश्वरत्वम्॥ ३१ ॥

गम्भीर-तार-रव-पूरित-दिग्विभागस्-
त्रैलोक्य-लोक-शुभ-सङ्गम-भूति-दक्षः।
सद्धर्म-राज-जय-घोषण-घोषकः सन्,
खे दुन्दुभि-र्ध्वनति ते यशसः प्रवादी॥ ३२ ॥

मन्दार-सुन्दर-नमेरु-सुपारिजात-
सन्तानकादि-कुसुमोत्कर-वृष्टि-रुद्धा।
गन्धोद-बिन्दु-शुभ-मन्द-मरुत्प्रपाता,
दिव्या दिवः पतति ते वचसां ततिर्वा॥ ३३ ॥

शुम्भत्-प्रभावलय-भूरि-विभा-विभोस्ते,
लोक-त्रये-द्युतिमतां द्युति-माक्षिपन्ती।
प्रोद्यद्-दिवाकर-निरन्तर-भूरि-संख्या,
दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोमसौम्याम्॥ ३४ ॥

स्वर्गापवर्ग-गम-मार्ग-विमार्गणेष्टः,
सद्धर्म-तत्त्व-कथनैक-पटुस्-त्रिलोक्याः।
दिव्य-ध्वनि-र्भवति ते विशदार्थ-सर्व-
भाषास्वभाव-परिणाम-गुणैः प्रयोज्यः॥ ३५ ॥

उन्निद्र-हेम-नव-पङ्कज-पुञ्ज-कान्ती,
पर्युल्लसन्-नख-मयूख-शिखाभिरामौ।
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र! धत्तः,
पद्मानि तत्र विबुधाः परिकल्पयन्ति॥ ३६ ॥

इत्थं यथा तव विभूति-रभूज्-जिनेन्द्र!
धर्मोपदेशन-विधौ न तथा परस्य।
यादृक्-प्रभा दिनकृतः प्रहतान्धकारा,
तादृक्-कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि॥ ३७ ॥

श्च्योतन्-मदाविल-विलोल-कपोल-मूल-
मत्त-भ्रमद्-भ्रमर-नाद-विवृद्ध-कोपम्।
ऐरावताभमिभ-मुद्धत-मापतन्तं,
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥ ३८ ॥

भिन्नेभ-कुम्भ-गल-दुज्ज्वल-शोणिताक्त-
मुक्ता-फल-प्रकरभूषित-भूमि-भागः।
बद्ध-क्रमः क्रम-गतं हरिणाधिपोऽपि,
नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते॥ ३९ ॥

कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-वह्नि-कल्पं,
दावानलं ज्वलित-मुज्ज्वल-मुत्स्फुलिङ्गम्।
विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख-मापतन्तं,
त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम्॥ ४० ॥

रक्तेक्षणं समद-कोकिल-कण्ठ-नीलम्,
क्रोधोद्धतं फणिन-मुत्फण-मापतन्तम्।
आक्रामति क्रम-युगेण निरस्त-शङ्कस्-
त्वन्नाम-नागदमनी हृदि यस्य पुंसः॥ ४१ ॥

वल्गत्-तुरङ्ग-गज-गर्जित-भीमनाद-
माजौ बलं बलवता-मपि-भूपतीनाम्।
उद्यद्-दिवाकर-मयूख-शिखापविद्धं,
त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति॥ ४२ ॥

कुन्ताग्र-भिन्न-गज-शोणित-वारिवाह-
वेगावतार-तरणातुर-योध-भीमे।
युद्धे जयं विजित-दुर्जय-जेय-पक्षास्-
त्वत्पाद-पङ्कज-वनाश्रयिणो लभन्ते॥ ४३ ॥

अम्भोनिधौ क्षुभित-भीषण-नक्र-चक्र-
पाठीन-पीठ-भय-दोल्वण-वाडवाग्नौ।
रङ्गत्तरङ्ग-शिखर-स्थित-यान-पात्रास्-
त्रासं विहाय भवतः स्मरणाद्-व्रजन्ति॥ ४४ ॥

उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार-भुग्नाः,
शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशाः।
त्वत्पाद-पङ्कज-रजो-मृत-दिग्ध-देहा,
मर्त्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्यरूपाः॥ ४५ ॥

आपाद-कण्ठमुरु-शृङ्खल-वेष्टिताङ्गा,
गाढं-बृहन्-निगड-कोटि-निघृष्ट-जङ्घाः।
त्वन्-नाम-मन्त्र-मनिशं मनुजाः स्मरन्तः,
सद्यः स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति॥ ४६ ॥

मत्त-द्विपेन्द्र-मृग-राज-दवानलाहि-
संग्राम-वारिधि-महोदर-बन्ध-नोत्थम्।
तस्याशु नाश-मुपयाति भयं भियेव,
यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमानधीते॥ ४७ ॥

स्तोत्र-स्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्निबद्धाम्,
भक्त्या मया रुचिर-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्।
धत्ते जनो य इह कण्ठ-गता-मजस्रं,
तं मानतुङ्ग-मवशा-समुपैति लक्ष्मीः॥ ४८ ॥

॥ इति श्री मानतुङ्गाचार्य-विरचितं श्री भक्तामर स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

सम्पूर्ण भावार्थ एवं व्याख्या

श्लोक १ भावार्थ: नतमस्तक हुए भक्त देवों के मुकुट-मणियों की कांति को प्रकाशित करने वाले, पाप रूपी अंधकार के समूह को नष्ट करने वाले तथा सृष्टि के आरंभ में संसार रूपी समुद्र में डूबते हुए प्राणियों के लिए एकमात्र सहारा बने हुए आदि-जिनेन्द्र भगवान ऋषभदेव के युगल चरणों में भली-भांति प्रणाम करता हूँ।

श्लोक २ भावार्थ: समस्त शास्त्र-तत्त्वों के ज्ञान से उत्पन्न हुई विशुद्ध बुद्धि वाले इन्द्रों ने तीनों लोकों के चित्त को हरने वाले जिन उदार स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति की है, उन्हीं प्रथम जिनेन्द्र भगवान की स्तुति करने का निश्चय मुझ जैसे अल्पज्ञानी ने भी किया है।

श्लोक ३ भावार्थ: हे देवों द्वारा पूजित चरणकमलों वाले प्रभु! बुद्धिहीन होते हुए भी आपकी स्तुति करने को उद्यत हुआ मैं लज्जारहित ही हूँ। जल में स्थित चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को अचानक पकड़ने की इच्छा नासमझ बालक को छोड़कर और कौन कर सकता है?

श्लोक ४ भावार्थ: हे गुणों के समुद्र! चन्द्रमा के समान धवल व सुन्दर आपके गुणों का वर्णन करने में देवगुरु बृहस्पति के समान बुद्धिमान भी समर्थ नहीं हैं। प्रलयकाल की आँधी से विकराल मगरमच्छों वाले क्षुब्ध महासागर को कोई अपनी भुजाओं से तैरकर पार कर सकता है क्या?

श्लोक ५ भावार्थ: हे मुनीश! असमर्थ होते हुए भी आपकी अनन्य भक्ति के वशीभूत होकर मैं आपकी स्तुति करने में प्रवृत्त हुआ हूँ। क्या हिरणी अपने बच्चे की रक्षा के लिए अपनी शक्ति का विचार किए बिना वात्सल्य-वश सिंह के सामने नहीं आ जाती?

श्लोक ६ भावार्थ: मैं अल्पज्ञ विद्वानों के परिहास का पात्र हूँ, फिर भी आपकी भक्ति ही मुझे स्तुति करने को विवश कर रही है। वसन्त ऋतु में कोयल जो मधुर गान करती है, उसका कारण आम्र-मंजरियों का खिलना ही तो है।

श्लोक ७ भावार्थ: आपकी स्तुति से जीवों के अनेक भवों के बंधे हुए पाप क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे सूर्य की किरणें फैलते ही तीनों लोकों में छाया भौंरे जैसा काला रात्रि का अंधकार तुरंत नष्ट हो जाता है।

श्लोक ८ भावार्थ: हे नाथ! ऐसा विचार कर अल्पबुद्धि होते हुए भी मैं आपकी स्तुति आरंभ कर रहा हूँ। आपके प्रभाव से यह स्तुति सज्जनों के चित्त को अवश्य प्रसन्न करेगी। कमल-पत्र पर पड़ी साधारण जल-बूंद भी क्या मोती जैसी शोभा प्राप्त नहीं कर लेती?

श्लोक ९ भावार्थ: दोषरहित आपकी संपूर्ण स्तुति की बात तो दूर रही, आपकी पवित्र कथा-चर्चा मात्र ही संसार के समस्त पापों को नष्ट कर देती है। सूर्य आकाश में बहुत दूर रहता है, फिर भी उसकी प्रभा ही जलाशयों के कमलों को खिला देती है।

श्लोक १० भावार्थ: हे तीनों लोकों के आभूषण! हे स्वामिन्! वास्तविक गुणों से आपकी स्तुति करने वाले भक्त आपके ही समान (सिद्ध-समान) हो जाते हैं, इसमें कोई आश्चर्य नहीं। वह स्वामी ही क्या, जो अपनी शरण में आए सेवक को अपने समान ऐश्वर्यशाली न बना दे!

श्लोक ११ भावार्थ: अपलक देखने योग्य आपके शांत स्वरूप को देखकर भक्तों के नेत्र अन्य किसी सांसारिक रूप पर मुग्ध नहीं होते। चन्द्रकिरणों के समान धवल क्षीरसमुद्र का मधुर दूध पी लेने के बाद कौन पुरुष खारे समुद्र का जल पीने की इच्छा करेगा?

श्लोक १२ भावार्थ: हे तीनों लोकों के अद्वितीय आभूषण! जिन वीतराग व कांतियुक्त परमाणुओं से आपका यह दिव्य रूप रचा गया, पृथ्वी पर वे श्रेष्ठ परमाणु उतने ही थे; तभी तो आपके समान रूपवान अन्य कोई दूसरा दिखाई नहीं देता।

श्लोक १३ भावार्थ: कहाँ देव, मनुष्य और धरणेन्द्रों के नेत्रों को आनंदित करने वाला तथा तीनों लोकों की समस्त उपमाओं को जीतने वाला आपका मुख-कमल, और कहाँ कलंक से मलिन चन्द्रमा का बिम्ब जो दिन में पलाश के सूखे पत्ते जैसा फीका पड़ जाता है!

श्लोक १४ भावार्थ: पूर्णिमा के चन्द्रमा की कलाओं के समान उज्ज्वल आपके गुण तीनों लोकों में व्याप्त हैं। जिन्होंने तीनों लोकों के एकमात्र स्वामी आपका आश्रय लिया हो, उन्हें स्वच्छंद रूप से विचरण करने से कौन रोक सकता है?

श्लोक १५ भावार्थ: देवांगनाओं (अप्सराओं) के रूप-लावण्य द्वारा आपका मन विकार मार्ग की ओर तनिक भी आकर्षित न किया जा सका, इसमें क्या आश्चर्य? प्रलयकाल की भीषण वायु से बड़े-बड़े पर्वत डोल जाते हैं, परंतु क्या कभी सुमेरु पर्वत का शिखर डिगा है?

श्लोक १६ भावार्थ: हे नाथ! आप एक ऐसे अलौकिक दीपक हैं जिसमें न तो धुएं वाली बत्ती है और न ही तेल की आवश्यकता, फिर भी आप तीनों लोकों को प्रकाशित करते हैं। पहाड़ों को हिला देने वाली आंधियाँ भी जिसे बुझा नहीं सकतीं, आप जगत् के अद्वितीय ज्ञान-दीपक हैं।

श्लोक १७ भावार्थ: हे मुनीन्द्र! आप न कभी अस्त होते हैं, न राहु द्वारा ग्रसे जाते हैं, और न ही बादलों से आपका तेज ढकता है। आप एक साथ संपूर्ण लोकों को प्रकाशित करते हैं। अतः आपकी महिमा सूर्य से भी कहीं अधिक श्रेष्ठ है।

श्लोक १८ भावार्थ: आपका मुख-कमल एक ऐसा अपूर्व चन्द्रमा है जो सदा उदित रहता है, मोहरूपी अंधकार को हरता है, जिसे न राहु ग्रस सकता है और न मेघ ढक सकते हैं। यह अपनी असीम कांति से संपूर्ण जगत को आलोकित करता है।

श्लोक १९ भावार्थ: हे नाथ! जब आपके मुख-चन्द्र से ही अज्ञान-अंधकार नष्ट हो गया, तब रात में चन्द्रमा और दिन में सूर्य का क्या प्रयोजन? जब धान के खेत पककर तैयार हो जाएं, तब जल से भरे मेघों की क्या आवश्यकता रह जाती है?

श्लोक २० भावार्थ: जैसा विशुद्ध केवलज्ञान आपके भीतर शोभायमान है, वैसा विष्णु-महेश आदि अन्य देवों में नहीं। जो चमक और प्रभाव देदीप्यमान महामणियों में होता है, वह किरणों से चमकते कांच के टुकड़े में कभी नहीं हो सकता।

श्लोक २१ भावार्थ: हे नाथ! मैं मानता हूँ कि पहले मैंने अन्य देवों को देखा, वही अच्छा था; क्योंकि उन्हें देखने के बाद ही मेरा हृदय आपके वीतराग स्वरूप से पूर्ण संतुष्ट हुआ। पर आपको देख लेने के बाद अब इस संसार में कोई अन्य देव जन्मांतर में भी मेरे मन को आकर्षित नहीं कर सकता।

श्लोक २२ भावार्थ: संसार में सैकड़ों स्त्रियाँ सैकड़ों पुत्रों को जन्म देती हैं, किंतु आपके समान पुत्र को जन्म देने वाली माता (मरुदेवी) अद्वितीय हैं। नक्षत्रों और तारों को तो सभी दिशाएँ धारण करती हैं, परंतु सहस्र किरणों वाले तेजस्वी सूर्य को केवल पूर्व दिशा ही प्रकट करती है।

श्लोक २३ भावार्थ: हे मुनीन्द्र! मुनिगण आपको मोहरूपी अंधकार से परे, सूर्य के समान तेजस्वी, निष्पाप परम-पुरुष मानते हैं। आपको भली-भांति जानकर ही वे मृत्यु (संसार) पर विजय प्राप्त करते हैं। मोक्ष-पद पाने का आपके सिवा अन्य कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है।

श्लोक २४ भावार्थ: ज्ञानी संत आपको अविनाशी, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, अगणित गुणों के धारक, आद्य पुरुष, ब्रह्मा, ईश्वर, अनंत, कामदेव-विजेता, योगियों के स्वामी, योग-ज्ञाता, अनेकांतमय होते हुए भी एक और निर्मल ज्ञानस्वरूप कहते हैं।

श्लोक २५ भावार्थ: हे प्रभु! देवों द्वारा पूजित तत्त्वज्ञान होने से आप ही 'बुद्ध' हैं; तीनों लोकों का कल्याण करने से आप ही 'शंकर' हैं; मोक्षमार्ग का विधान करने से आप ही 'धाता' (सृष्टिकर्ता) हैं; और हे धीर वीर प्रभु! आप ही साक्षात् 'पुरुषोत्तम' हैं।

श्लोक २६ भावार्थ: हे नाथ! तीनों लोकों के दुखों को हरने वाले आपको नमस्कार! पृथ्वीतल के निर्मल आभूषण-स्वरूप आपको नमस्कार! तीनों लोकों के परमेश्वर आपको नमस्कार! और हे जिनेंद्र! संसार-समुद्र को सुखा देने वाले आपको बारंबार नमस्कार!

श्लोक २७ भावार्थ: हे मुनीश! अन्यत्र स्थान न मिलने से यदि समस्त सद्गुणों ने आपका आश्रय लिया हो, तो इसमें क्या आश्चर्य? अन्य जीवों में आश्रय पाकर अहंकारी बने हुए दोषों ने तो स्वप्न में भी कभी आपकी ओर नहीं देखा।

श्लोक २८ भावार्थ (अशोक वृक्ष प्रातिहार्य): ऊँचे अशोक वृक्ष के नीचे विराजमान किरणों से दीप्त आपका निर्मल स्वरूप ऐसा सुशोभित होता है, मानो सघन बादलों के पार्श्व में स्थित अंधकार-नाशक देदीप्यमान सूर्य-बिम्ब चमक रहा हो।

श्लोक २९ भावार्थ (सिंहासन प्रातिहार्य): मणियों की रंग-बिरंगी किरणों वाले सिंहासन पर आपका सुवर्ण-समान तेजस्वी शरीर ऐसे शोभित होता है, मानो उदयाचल के ऊँचे शिखर पर आकाश में फैली किरण-मालाओं वाला सूर्य सुशोभित हो रहा हो।

श्लोक ३० भावार्थ (चामर प्रातिहार्य): कुन्द पुष्प के समान श्वेत, ढुलते हुए चंवरों से युक्त आपका सुवर्ण-समान कांतियुक्त शरीर ऐसा शोभायमान होता है, मानो सुमेरु पर्वत के स्वर्णिम तट से चन्द्रमा के समान धवल निर्मल झरने बह रहे हों।

श्लोक ३१ भावार्थ (छत्रत्रय प्रातिहार्य): आपके मस्तक के ऊपर स्थित चन्द्रमा के समान श्वेत, मोतियों की झालरों से युक्त और सूर्य के ताप को रोकने वाले तीन छत्र ऐसे शोभित होते हैं, मानो वे आपके तीनों लोकों के स्वामित्व की घोषणा कर रहे हों।

श्लोक ३२ भावार्थ (देव-दुन्दुभि प्रातिहार्य): दसों दिशाओं को गुंजायमान करने वाली, तीनों लोकों के जीवों को कल्याणकारी धर्म-लाभ कराने में समर्थ और आपके यश का गान करने वाली देव-दुन्दुभि आकाश में गूंजकर आपके 'सद्धर्मराज' होने की जय-घोषणा करती है।

श्लोक ३३ भावार्थ (दिव्य पुष्पवृष्टि प्रातिहार्य): मंदार, पारिजात आदि कल्पवृक्षों के खिले पुष्पों की वर्षा, सुगंधित जल-कण और मन्द-सुगंधित वायु के साथ आकाश से बरसती है; ऐसा लगता है मानो आपके कल्याणकारी वचनों की पंक्ति ही धरती पर उतर रही हो।

श्लोक ३४ भावार्थ (भामंडल प्रातिहार्य): हे प्रभो! आपका अत्यंत तेजोमय भामंडल तीनों लोकों के समस्त ज्योतिर्मय पदार्थों के तेज को तिरस्कृत करता है। यह एक साथ उदित अनेक सूर्यों के समान तेजस्वी होकर भी चन्द्रमा जैसी शांत शीतलता प्रदान करता है।

श्लोक ३५ भावार्थ (दिव्यध्वनि प्रातिहार्य): स्वर्ग और मोक्ष के मार्ग को दिखाने वाली, सत्य धर्म के तत्त्वों का उपदेश देने में निपुण और सभी जीवों की अपनी-अपनी भाषाओं में स्वतः परिवर्तित होने वाली आपकी कल्याणकारी 'दिव्यध्वनि' खिरती है।

श्लोक ३६ भावार्थ: हे जिनेन्द्र! खिले हुए स्वर्ण-कमलों जैसी कांति वाले तथा नखों की कांति से शोभायमान आपके दोनों चरण जहाँ-जहाँ पड़ते हैं, वहाँ-वहाँ देवगण सुवर्णमयी कमलों की रचना करते जाते हैं।

श्लोक ३७ भावार्थ: हे जिनेन्द्र! धर्मोपदेश के समय जैसी अलौकिक विभूति (प्रातिहार्य) आपके पास प्रकट हुई, वैसी अन्य किसी देव की नहीं। अंधकार का नाश करने वाला जो प्रकाश सूर्य में होता है, वह चमकते हुए अन्य ग्रहों और तारों में कहाँ हो सकता है?

श्लोक ३८ भावार्थ: गंडस्थलों से मद बहने के कारण भिनभिनाते भौरों की गूंज से अत्यंत कुपित, ऐरावत जैसा विशालकाय उन्मत्त हाथी भी यदि सामने आक्रमण करने दौड़े, तो भी आपकी शरण में आए भक्तों को उसका रंचमात्र भी भय नहीं होता।

श्लोक ३९ भावार्थ: जिसने हाथियों के मस्तक विदीर्ण कर लाल रक्त और मोतियों से पृथ्वी को पाट दिया हो, ऐसा छलांग लगाने को तैयार हिंसक सिंह भी, आपके चरणकमलों का आश्रय लेने वाले भक्त पर कभी आक्रमण नहीं कर पाता।

श्लोक ४० भावार्थ: प्रलयकाल की वायु से भड़की, चिनगारियों को उगलती और मानो पूरे संसार को निगल जाने को आतुर भीषण दावानल (अग्नि) को भी आपके नाम-स्मरण रूपी जल की धारा क्षणभर में पूर्णतः शांत कर देती है।

श्लोक ४१ भावार्थ: लाल आँखों वाले, कोयल के कंठ जैसे काले, क्रोध से फन फैलाए फुंकारते हुए भयंकर विषैले नाग को भी वह भक्त निडर होकर अपने पैरों से लांघ जाता है, जिसके हृदय में आपका नाम रूपी 'नागदमनी' (सर्पनाशक) बूटी विद्यमान है।

श्लोक ४२ भावार्थ: युद्धभूमि में हिनहिनाते घोड़ों और गरजते हाथियों के भयानक कोलाहल से युक्त बलवान राजाओं की विशाल सेना भी, आपके नाम-स्मरण से ऐसे तितर-बितर हो जाती है जैसे उगते सूर्य की किरणों से घना अंधकार नष्ट हो जाता है।

श्लोक ४३ भावार्थ: भालों की नोकों से बिंधे हाथियों के बहते रक्त की नदी को पार करने में घबराते योद्धाओं से युक्त अति-भीषण युद्ध में भी, आपके चरण-कमलों का आश्रय लेने वाले भक्त दुर्जय शत्रुओं को जीतकर सहज विजय प्राप्त करते हैं।

श्लोक ४४ भावार्थ: भयानक मगरमच्छों, विशाल मछलियों और बड़वानल की ज्वालाओं से क्षुब्ध महासागर में, उठती तूफानी लहरों पर डोलते हुए जहाज पर सवार यात्री भी आपके स्मरण मात्र से निर्भय होकर समुद्र पार कर जाते हैं।

श्लोक ४५ भावार्थ: असह्य जलोदर जैसे असाध्य रोगों के भार से झुके हुए, दयनीय दशा को प्राप्त और जीवन की आशा छोड़ चुके रोगी मनुष्य भी, आपके चरण-कमलों की रज रूपी अमृत का लेप पाकर कामदेव के समान स्वस्थ व रूपवान बन जाते हैं।

श्लोक ४६ भावार्थ: पैरों से लेकर गले तक लोहे की भारी बेड़ियों से जकड़े हुए और विशाल सांकलों से छिले हुए अंगों वाले बंदी पुरुष भी, आपके नाम-मंत्र का निरंतर स्मरण करने से शीघ्र ही बंधनों से मुक्त होकर निर्भय हो जाते हैं।

श्लोक ४७ भावार्थ: मत्त हाथी, सिंह, दावानल, विषैला नाग, युद्ध, महासागर, असाध्य महारोग और कारागार के बंधन से उत्पन्न होने वाले समस्त भय उस बुद्धिमान पुरुष को देखकर स्वयं भयभीत होकर भाग जाते हैं, जो आपके इस स्तोत्र का नित्य पाठ करता है।

श्लोक ४८ भावार्थ: हे जिनेन्द्र प्रभु! आपके अनन्त गुणों से गूँथी हुई, भक्ति रूपी सुंदर वर्णमय पुष्पों की इस स्तोत्र रूपी माला को जो भव्य पुरुष नित्य अपने कंठ में धारण (कंठस्थ या पठन) करता है, उस उन्नत आत्मा (मानतुंग) के पास मुक्ति-लक्ष्मी (एवं लौकिक संपदा) स्वयं दौड़ी चली आती है।

॥ इति श्री मानतुङ्गाचार्य-विरचितं श्री भक्तामर स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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