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॥ श्री गणेश चतुर्थी महाग्रन्थ एवं समग्र पूजा-विधान ॥

प्राकट्य रहस्य • अथर्वशीर्ष • चालीसा • ३२ स्वरूप • १०८ नामावली • भोग विधियाँ
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प्रथम खण्ड

गणेश चतुर्थी परिचय एवं चन्द्र-दर्शन दोष-निवारण

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को देवाधिदेव महादेव एवं जगन्माता पार्वती के लाडले सुपुत्र, विद्या-बुद्धि प्रदाता, विघ्नविनाशक भगवान श्री गणेश जी का जन्मोत्सव सम्पूर्ण विश्व में अपार श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। सनातन धर्म में किसी भी देव-आराधना, यज्ञ, अनुष्ठान या नवीन कार्य के प्रारम्भ में सर्वप्रथम गणेश जी का ही स्मरण व पूजन किया जाता है।

चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन निषेध एवं स्यमन्तक मणि की पौराणिक कथा

गणेश चतुर्थी की रात्रि को चन्द्रमा के दर्शन करना शास्त्रों में वर्जित बताया गया है। मान्यता है कि इस रात्रि चन्द्र दर्शन करने से व्यक्ति पर मिथ्या कलंक (अपयश) लगता है।

पौराणिक आख्यान: एक बार गणेश जी अपने वाहन मूषक पर सवार होकर जा रहे थे। मार्ग में एक सर्प के आने से मूषक विचलित हुआ और गणेश जी फिसल गए। इस दृश्य को देखकर चन्द्रलोक से चन्द्रमा ने उनका उपहास उड़ाया। चन्द्रमा के इस अहंकार को देखकर भगवान गणेश ने उन्हें शाप दिया कि जो भी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को तुम्हारा दर्शन करेगा, वह समाज में कलंकित होगा।

सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः ।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥
दोष निवारण उपाय: यदि भूलवश चतुर्थी की रात्रि चन्द्रमा दिख जाए, तो उपर्युक्त मन्त्र का जाप करते हुए पवित्र जल से अर्घ्य देना चाहिए तथा श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध (अध्याय ५६-५७) में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण और 'स्यमन्तक मणि चोरी प्रसंग' की कथा का श्रवण करना चाहिए।
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द्वितीय खण्ड

श्री गणेश जी का प्राकट्य एवं स्वरूप का दार्शनिक रहस्य

शिवपुराण के अनुसार, माता पार्वती ने स्नान से पूर्व अपने शरीर के चन्दन-उबटन से एक बालक की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करके उसे भवन के द्वार पर पहरेदारी हेतु नियुक्त किया। जब भगवान शिव वहाँ पधारे, तो बालक गणेश ने आज्ञानुसार उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। शिवजी के गणों व बालक के बीच युद्ध हुआ, जिसमें अनभिज्ञतावश शिवजी के त्रिशूल से बालक का मस्तक कट गया।

माता पार्वती के असह्य दुःख व क्रोध को शान्त करने हेतु, भगवान शिव के निर्देश पर उत्तर दिशा में प्रथम मिले गज (हाथी) का मस्तक लाकर बालक के धड़ से जोड़ा गया। भगवान शिव, विष्णु व समस्त देवताओं ने बालक को पुनर्जीवित कर 'गणेश', 'गणाध्यक्ष' और 'सर्वप्रथम पूज्य' होने का वरदान दिया।

गणेश स्वरूप का आध्यात्मिक व यौगिक सन्देश

१. गज मस्तक (विशाल सिर): उत्कृष्ट बुद्धि, गम्भीर सोच और दूरदर्शिता का प्रतीक।
२. सूप जैसे कान (शूर्पकर्ण): संसार की व्यर्थ बातों को छोड़कर केवल ज्ञानवर्धक व सारभूत बातों को ग्रहण करना।
३. विशाल उदर (लम्बोदर): ब्रह्माण्ड के समस्त सुख-दुःख व रहस्यों को अपने भीतर पचाने की अगाध क्षमता।
४. मूषक वाहन (चूहा): चंचल मन, वासना और अहंकार पर पूर्ण नियन्त्रण व विवेक की विजय।
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तृतीय खण्ड

भगवान श्री गणेश के ३२ दिव्य स्वरूप

मुद्गल पुराण एवं आगम ग्रन्थों में भगवान गणेश जी के ३२ मंगलकारी स्वरूपों का वर्णन है:

१. बाल गणपति: बाल सुलभ षोडश भुजाओं वाला रूप।
२. तरुण गणपति: मध्याह्न सूर्य समान तेजस्वी युवा रूप।
३. भक्ति गणपति: भक्तों को अभय व शान्ति देने वाला सौम्य रूप।
४. वीर गणपति: अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित योद्धा रूप।
५. शक्ति गणपति: वाम भाग में शक्ति को धारण किए रूप।
६. द्विज गणपति: वेद-शास्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मण रूप।
७. सिद्धि गणपति: समस्त अष्ट-सिद्धियों के स्वामी रूप।
८. उच्छिष्ट गणपति: तान्त्रिक अभीष्ट फलदाता स्वरूप।
९. विघ्न गणपति: समस्त संकटों का शमन करने वाले।
१०. क्षिप्र गणपति: अति शीघ्र फल प्रदान करने वाले।
११. हेरम्ब गणपति: पंचमुखी, सिंह पर आरूढ़ रक्षक रूप।
१२. लक्ष्मी गणपति: ऐश्वर्य, ऋद्धि-सिद्धि प्रदाता रूप।
१३. महा गणपति: त्रिनेत्रधारी विराट परमेश्वर रूप।
१४. विजय गणपति: शत्रुओं पर विजय दिलाने वाले।
१५. नृत्य गणपति: कल्पवृक्ष तले आनन्द नृत्य मुद्रा।
१६. ऊर्ध्व गणपति: आत्मिक उत्थान व मोक्ष प्रदाता।
१७. एकाक्षर गणपति: ॐकार (प्रणव) एकाक्षर स्वरूप।
१८. वरद गणपति: भक्तों को अभीष्ट वरदान देने वाले।
१९. त्र्यक्षर गणपति: 'गं' बीजमन्त्र के अधिष्ठाता।
२०. क्षिप्र प्रसाद गणपति: तुरंत कृपा बरसाने वाले दयालु रूप।
२१. हरिद्रा गणपति: हल्दी निर्मित पीतवर्णी मङ्गल रूप।
२२. एकदन्त गणपति: अद्वैत सत्य के प्रतीक एक दाँत वाले।
२३. सृष्टि गणपति: सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रचयिता रूप।
२४. उद्दण्ड गणपति: अधर्म और दुष्टों के संहारक।
२५. ऋणमोचन गणपति: समस्त भौतिक व आध्यात्मिक ऋणमुक्ति।
२६. ढुण्ढि गणपति: काशी क्षेत्र के रक्षक व दिशा-प्रदर्शक।
२७. द्विमुख गणपति: दो मुखों वाले अन्तर्मुखी रूप।
२८. त्रिमुख गणपति: तीन नेत्र व तीन मुख वाले रूप।
२९. सिंह गणपति: सिंहवाहिनी शक्ति से युक्त निर्भय रूप।
३०. योग गणपति: योग-पट्ट बाँधकर समाधिस्थ योगी रूप।
३१. दुर्गा गणपति: माँ दुर्गा समान अजेय शक्ति स्वरूप।
३२. सङ्कटहर गणपति: भक्तों के घोर कष्टों को हरने वाले।
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चतुर्थ खण्ड

भगवान श्री गणेश के १०८ पावन नाम व अर्थ

क्र. दिव्य नाम गूढ़ अर्थ क्र. दिव्य नाम गूढ़ अर्थ
अखूरथमूषक को वाहन बनाने वाले५५मृत्युञ्जयमृत्यु पर विजय पाने वाले
अलम्पटनित्य शाश्वत परमेश्वर५६मुण्डाकरमआनन्द और सुख के धाम
अमितअतुलनीय महिमा वाले५७मुक्तिदायीमोक्ष प्रदान करने वाले
अनन्तचिद्रूपमयअनन्त चेतना स्वरूप५८मूषकवाहनचूहे की सवारी करने वाले
अवनीशसम्पूर्ण पृथ्वी के स्वामी५९नादप्रतिष्ठितनाद-संगीत के प्रेमी
अविघ्नबाधाओं को हरने वाले६०नमस्तेतुपापों का संहार करने वाले
बालगणपतिप्रिय बाल रूपधारी६१नन्दनशिवजी के लाडले पुत्र
भालचन्द्रमस्तक पर चन्द्रमा धारक६२निधीश्वरमसमस्त धन-निधियों के दाता
भीमविशाल और महाबली६३ॐकारप्रणव ॐ स्वरूप वाले
१०भूपतिदेवताओं के रक्षक राजा६४पीताम्बरपीले वस्त्र धारण करने वाले
११भुवनपतितीनों लोकों के अधिपति६५प्रमोदपरमानन्द के स्वामी
१२बुद्धिनाथविवेक और बुद्धि के ईश६६प्रथ Broadway मेश्वरसमस्त देवों में प्रथम पूज्य
१३बुद्धिप्रियज्ञान के प्रेमी६७पुरुषसर्वव्यापी परम पुरुष
१४बुद्धिविधाताज्ञान प्रदान करने वाले६८रक्तलाल कान्ति वाले प्रभु
१५चतुर्भुजचार भुजाओं वाले६९रुद्रप्रियभगवान शिव के अतिप्रिय
१६देवदेवदेवों के भी देव७०सर्वदेवात्मकसब देवों की आहुति ग्रहणकर्ता
१७देवान्तकनाशकारीदैत्यों का नाश करने वाले७१सर्वसिद्धान्तसमस्त विद्याओं के मूल
१८देवव्रततपस्या स्वीकारने वाले७२सर्वात्मनब्रह्माण्ड के रक्षक
१९देवेन्द्रशिखाइन्द्रादि के रक्षक७३शाम्भवीपार्वती नन्दन
२०धार्मिकधर्म व दान के दाता७४शशिवर्णम्चन्द्रमा जैसी शीतल आभा वाले
२१धूम्रवर्णधुएँ जैसे रंग वाले७५शूर्पकर्णसूप के समान बड़े कान वाले
२२दुर्जयजिन्हें जीता न जा सके७६शुभनपरम मङ्गलकारी प्रभु
२३द्वैमातुरदो माताओं (पार्वती-मालिनी) वाले७७शुभगुणकाननसमस्त सद्गुणों के सागर
२४एकाक्षरएक अक्षर (प्रणव) मय७८श्वेतपरम शुद्ध व निष्कलंक
२५एकदन्तएक दाँत वाले सत्य स्वरूप७९सिद्धिदातासफलता देने वाले
२६एकदृष्टअद्वितीय दृष्टि वाले८०सिद्धिप्रियसिद्धियों के वरदानी
२७ईशानपुत्रभगवान शिव के सुपुत्र८१सिद्धिविनायकसिद्धियों के नायक
२८गदाधरगदा अस्त्र धारण करने वाले८२स्कन्दपूर्वजकार्तिकेय के बड़े भ्राता
२९गजकर्णगज के समान कान वाले८३सुमुखअति सुन्दर मुख वाले
३०गजाननहाथी के मुख वाले८४सुरेश्वरमदेवताओं के अधिपति
३१गजाननेतिगजमुख के नाम से विख्यात८५स्वरूपपरम सौन्दर्य के प्रेमी
३२गजवक्रहाथी की सूँड वाले८६तरुणसदा नवीन व अजर
३३गजवक्त्रगज समान मुखमण्डल८७उद्दण्डअधर्मियों के दण्डदाता
३४गणाध्यक्षसमस्त गणों के अध्यक्ष८८उमापुत्रमाता उमा के दुलारे
३५गणाध्यक्षीणपिण्डों व नक्षत्रों के स्वामी८९वक्रतुण्डघुमावदार सूँड वाले
३६गणपतिसमस्त गणों के पालक९०वरगणपतिवरदानों के स्वामी
३७गौरीसुतमाता गौरी के पुत्र९१वरप्रदमनोकामना पूर्ण करने वाले
३८गुणीनसर्वगुणसम्पन्न प्रभु९२वरदविनायकजय व विजय देने वाले
३९हरिद्रास्वर्ण-पीत कान्ति वाले९३वीरगणपतिपराक्रमी योद्धा
४०हेरम्बदीन-दुखियों के रक्षक९४विद्यावारिधिज्ञान के अथााह सागर
४१कपिलधूसर/भूरे वर्ण वाले९५विघ्नहारकरुकावटों को हरने वाले
४२कवीशविद्वानों और कवियों के ईश९६विघ्नहर्तासंकट मोचन
४३कीर्तियश और प्रतिष्ठा प्रदाता९७विघ्नराजविघ्नों के नियन्ता
४४कृपालुपरम दयालु भगवान९८विघ्नराजेन्द्रबाधाओं के महाराजा
४५कृष्णपिङ्गाक्षपीली-काली आँखों वाले९९विघ्नविनाशनबाधाओं को समूल नष्ट करने वाले
४६क्षमाकरमक्षमा के परम धाम१००विघ्नेश्वरविघ्नों के ईश्वर
४७क्षिप्रशीघ्र प्रसन्न होने वाले१०१विकटविराट और विकराल
४८लम्बकर्णविशाल कानों वाले१०२विनायकसबके परम नायक
४९लम्बोदरविशाल उदर वाले१०३विश्वमुखसम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के मुख
५०महाबलअनन्त बलशाली१०४विश्वराजजगत के सम्राट
५१महागणपतिदेवाधिदेव गणपति१०५यज्ञकाययज्ञों को स्वीकारने वाले
५२महेश्वरम्सृष्टि के महेश्वर१०६यशस्करमकीर्ति व सौभाग्य प्रदाता
५३मङ्गलमूर्तिकल्याण के साक्षात् विग्रह१०७यशस्वीसर्वत्र पूजित प्रभु
५४मनोमयमन को जीतने वाले१०८योगाधिपयोग व ध्यान के स्वामी
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पञ्चम खण्ड

चतुर्थी तिथियों का विशेष माहात्म्य

शास्त्रों में भगवान गणेश की उपासना हेतु चतुर्थी तिथि को सर्वोत्तम माना गया है:

१. सङ्कष्टी चतुर्थी (कृष्ण पक्ष): प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी। इसमें दिनभर उपवास रहकर सायंकाल गणेश पूजन किया जाता है और रात्रि में चन्द्रोदय के समय चन्द्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण होता है। यह जीवन के घोर संकटों को हरने वाला है।
२. विनायकी चतुर्थी (शुक्ल पक्ष): प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी। इसमें मध्याह्न (दोपहर) काल में षोडशोपचार पूजा का विधान है। यह विद्या, ज्ञान और कार्य-सिद्धि प्रदान करती है।
३. अङ्गारकी चतुर्थी (महा-फलदायी योग): जब कोई सङ्कष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन पड़ती है, तो उसे 'अङ्गारकी चतुर्थी' कहा जाता है। इस एक दिन व्रत करने से सम्पूर्ण वर्ष की २४ चतुर्थियों के व्रत का पुण्य प्राप्त होता है तथा समस्त प्रकार के ऋणों (कर्ज) व मंगल दोष से मुक्ति मिलती है।
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षष्ठ खण्ड

श्री गणेश चालीसा (सार्थ - अर्थ सहित)

॥ दोहा ॥
जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल ।
विघ्न हरण मङ्गल करण, जय जय गिरिजालाल ॥
भावार्थ: हे सद्गुणों के धाम, श्रेष्ठ कवियों में वन्दनीय, दयालु, समस्त विघ्नों को हरने वाले और मङ्गल करने वाले माता पार्वती के लाडले पुत्र श्री गणेश! आपकी सदा जय हो।
॥ चौपाई ॥
जय जय जय गणपति गणराजू । मंगल भरण करण शुभ काजू ॥
जय गजबदन सदन सुखदाता । विश्व विनायक बुद्धि विधाता ॥ १ ॥

वक्रतुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन । तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ॥
राजित मणिमुक्तन उर माला । स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ॥ २ ॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं । मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजे । चरण पादुका मुनि मन राजे ॥ ३ ॥

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता । गौरी ललन विश्व-विख्याता ॥
ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे । मूषक वाहन सोहत द्वारे ॥ ४ ॥

कहौं जन्म शुभ-कथा तुम्हारी । अति विचित्र अति बुद्धि उदारी ॥
एक समय गिरिराज कुमारी । पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी ॥ ५ ॥

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा । तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा ॥
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी । बहुविधि सेवा करी तुम्हारी ॥ ६ ॥

अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा । मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ॥
मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला । बिना गर्भ धारण यहिकाला ॥ ७ ॥

गणपति गणनायक मन बहलावन । सुर नर मुनि जन के सुख भावन ॥
जब सब देव मिलन तुम आए । लखि शनीचर हिय सकुचाए ॥ ८ ॥

शनि की नज़र पड़ी जब जाई । गिर गयो शीश भूमि पर आई ॥
मचि गयो सकल स्वर्ग हड़कम्पा । माता भई विकल अति रम्भा ॥ ९ ॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये । काटि शीश गज को ले आये ॥
धड़ ऊपर स्थित कर दीन्हो । प्राण वायु संजीवन कीन्हो ॥ १० ॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे । प्रथम पूज्य वर तुमको दीन्हे ॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा । पृथ्वी कर प्रदक्षिणा दीन्हा ॥ ११ ॥

चले षडानन भरमि भुलाई । रचे बैठि तुम बुद्धि उपाई ॥
माता-पिता चरण धरि लीन्हे । तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हे ॥ १२ ॥

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे । नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे ॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई । शेष सहसमुख सकै न गाई ॥ १३ ॥

मैं मतिहीन मलीन दुखारी । करहुँ कृपा भव-भय-हारी ॥
जयति जयति जय मूषक वाहक । जयति भवानी सुवन सुखदायक ॥ १४ ॥
॥ दोहा ॥
संवत संवत सहस्र दस, आठ सतासी जान ।
ऋषि पंचमी रवि सुदिन, पूर्ण चालीसा जान ॥
नित नेम उठि प्रात ही, पाठ करै चालीसा ।
ताके घर सुख-सम्पत्ति, नित देहिं गौरीशा ॥
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सप्तम खण्ड

श्री गणपति अथर्वशीर्ष (सार्थ - वेद मन्त्र)

॥ शान्ति पाठ ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः । व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
ॐ नमस्ते गणपतये ॥ १ ॥
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि । त्वमेव केवलं कर्ताऽसि । त्वमेव केवलं धर्ताऽसि । त्वमेव केवलं हर्ताऽसि । त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि । त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ॥ २ ॥
अर्थ: हे गणपति! आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्यक्ष परम तत्त्व हैं। आप ही सृष्टि के सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। आप ही सर्वव्यापी ब्रह्म और नित्य आत्मा हैं।
ऋतं वच्मि । सत्यं वच्मि ॥ ३ ॥
अर्थ: मैं यथार्थ (दैवीय विधान) कहता हूँ। मैं त्रिकाल सत्य कहता हूँ।
अव त्वं माम् । अव वक्तारम् । अव श्रोतारम् । अव दातारम् । अव धातारम् । अवानूचानमव शिष्यम् । अव पश्चात्तात् । अव पुरस्तात् । अवोत्तरात्तात् । अव दक्षिणात्तात् । अव चोध्र्वात्तात् । अवाधरात्तात् । सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् ॥ ४ ॥
अर्थ: हे प्रभु! आप मेरी रक्षा करें। वक्ता, श्रोता, दाता, धारणा करने वाले, गुरु और शिष्य की रक्षा करें। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे—सभी दिशाओं से सर्वदा मेरी रक्षा करें।
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः । त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः । त्वं सच्चिदानन्दाऽद्वितीयोऽसि । त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥ ५ ॥
अर्थ: आप शब्दमय, चैतन्यमय, आनन्दमय और ब्रह्ममय हैं। आप अद्वितीय सच्चिदानन्द हैं। आप प्रत्यक्ष ज्ञान और विज्ञान स्वरूप हैं।
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते । सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति । सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति । सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति । त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः । त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥ ६ ॥
अर्थ: यह सम्पूर्ण विश्व आपसे उत्पन्न होता है, आप में ही स्थित रहता है और आप ही में विलीन हो जाता है। आप ही पंचमहाभूत (भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और वाणी के चार रूप (परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी) हैं।
त्वं गुणत्रयातीतः । त्वं देहत्रयातीतः । त्वं कालत्रयातीतः । त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम् । त्वं शक्तित्रयात्मकः । त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् । त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् ॥ ७ ॥
अर्थ: आप तीनों गुणों (सत्व, रज, तम), तीनों शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) और तीनों कालों से परे हैं। आप मूलाधार चक्र में नित्य स्थित हैं। आप इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति स्वरूप हैं। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा और ॐकार हैं।
गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम् । अनुस्वारः परतरः । अर्धेन्दुलसितम् । तारेण ऋद्धम् । एतत्तव मनुस्वरूपम् । गकारः पूर्वरूपम् । अकारो मध्यमरूपम् । अनुस्वारश्चान्त्यरूपम् । बिन्दुरुत्तररूपम् । नादः सन्धानम् । संहिता सन्धिः । सैषा गणेशविद्या । गणक ऋषिः । निचृद्गायत्रीच्छन्दः । गणपतिर्देवता । ॐ गं गणपतये नमः ॥ ८ ॥
अर्थ: 'ग' कार पूर्वरूप, 'अ' कार मध्यरूप, अनुस्वार अन्त्यरूप और बिन्दु उत्तररूप है। जब यह ॐ से संयुक्त होता है, तो महामन्त्र 'ॐ गं गणपतये नमः' निष्पन्न होता है। इसके ऋषि गणक, छन्द निचृद्गायत्री और देवता श्री गणपति हैं।
एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥ ९ ॥

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम् । रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥
रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् । रक्तगन्धानुलिप्ताङ्

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