श्री गणेश चतुर्थी महाग्रन्थ एवं समग्र पूजा-विधान
॥ श्री गणेश चतुर्थी महाग्रन्थ एवं समग्र पूजा-विधान ॥
गणेश चतुर्थी परिचय एवं चन्द्र-दर्शन दोष-निवारण
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को देवाधिदेव महादेव एवं जगन्माता पार्वती के लाडले सुपुत्र, विद्या-बुद्धि प्रदाता, विघ्नविनाशक भगवान श्री गणेश जी का जन्मोत्सव सम्पूर्ण विश्व में अपार श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। सनातन धर्म में किसी भी देव-आराधना, यज्ञ, अनुष्ठान या नवीन कार्य के प्रारम्भ में सर्वप्रथम गणेश जी का ही स्मरण व पूजन किया जाता है।
चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन निषेध एवं स्यमन्तक मणि की पौराणिक कथा
गणेश चतुर्थी की रात्रि को चन्द्रमा के दर्शन करना शास्त्रों में वर्जित बताया गया है। मान्यता है कि इस रात्रि चन्द्र दर्शन करने से व्यक्ति पर मिथ्या कलंक (अपयश) लगता है।
पौराणिक आख्यान: एक बार गणेश जी अपने वाहन मूषक पर सवार होकर जा रहे थे। मार्ग में एक सर्प के आने से मूषक विचलित हुआ और गणेश जी फिसल गए। इस दृश्य को देखकर चन्द्रलोक से चन्द्रमा ने उनका उपहास उड़ाया। चन्द्रमा के इस अहंकार को देखकर भगवान गणेश ने उन्हें शाप दिया कि जो भी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को तुम्हारा दर्शन करेगा, वह समाज में कलंकित होगा।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥
श्री गणेश जी का प्राकट्य एवं स्वरूप का दार्शनिक रहस्य
शिवपुराण के अनुसार, माता पार्वती ने स्नान से पूर्व अपने शरीर के चन्दन-उबटन से एक बालक की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करके उसे भवन के द्वार पर पहरेदारी हेतु नियुक्त किया। जब भगवान शिव वहाँ पधारे, तो बालक गणेश ने आज्ञानुसार उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। शिवजी के गणों व बालक के बीच युद्ध हुआ, जिसमें अनभिज्ञतावश शिवजी के त्रिशूल से बालक का मस्तक कट गया।
माता पार्वती के असह्य दुःख व क्रोध को शान्त करने हेतु, भगवान शिव के निर्देश पर उत्तर दिशा में प्रथम मिले गज (हाथी) का मस्तक लाकर बालक के धड़ से जोड़ा गया। भगवान शिव, विष्णु व समस्त देवताओं ने बालक को पुनर्जीवित कर 'गणेश', 'गणाध्यक्ष' और 'सर्वप्रथम पूज्य' होने का वरदान दिया।
गणेश स्वरूप का आध्यात्मिक व यौगिक सन्देश
भगवान श्री गणेश के ३२ दिव्य स्वरूप
मुद्गल पुराण एवं आगम ग्रन्थों में भगवान गणेश जी के ३२ मंगलकारी स्वरूपों का वर्णन है:
भगवान श्री गणेश के १०८ पावन नाम व अर्थ
| क्र. | दिव्य नाम | गूढ़ अर्थ | क्र. | दिव्य नाम | गूढ़ अर्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| १ | अखूरथ | मूषक को वाहन बनाने वाले | ५५ | मृत्युञ्जय | मृत्यु पर विजय पाने वाले |
| २ | अलम्पट | नित्य शाश्वत परमेश्वर | ५६ | मुण्डाकरम | आनन्द और सुख के धाम |
| ३ | अमित | अतुलनीय महिमा वाले | ५७ | मुक्तिदायी | मोक्ष प्रदान करने वाले |
| ४ | अनन्तचिद्रूपमय | अनन्त चेतना स्वरूप | ५८ | मूषकवाहन | चूहे की सवारी करने वाले |
| ५ | अवनीश | सम्पूर्ण पृथ्वी के स्वामी | ५९ | नादप्रतिष्ठित | नाद-संगीत के प्रेमी |
| ६ | अविघ्न | बाधाओं को हरने वाले | ६० | नमस्तेतु | पापों का संहार करने वाले |
| ७ | बालगणपति | प्रिय बाल रूपधारी | ६१ | नन्दन | शिवजी के लाडले पुत्र |
| ८ | भालचन्द्र | मस्तक पर चन्द्रमा धारक | ६२ | निधीश्वरम | समस्त धन-निधियों के दाता |
| ९ | भीम | विशाल और महाबली | ६३ | ॐकार | प्रणव ॐ स्वरूप वाले |
| १० | भूपति | देवताओं के रक्षक राजा | ६४ | पीताम्बर | पीले वस्त्र धारण करने वाले |
| ११ | भुवनपति | तीनों लोकों के अधिपति | ६५ | प्रमोद | परमानन्द के स्वामी |
| १२ | बुद्धिनाथ | विवेक और बुद्धि के ईश | ६६ | प्रथ Broadway मेश्वर | समस्त देवों में प्रथम पूज्य |
| १३ | बुद्धिप्रिय | ज्ञान के प्रेमी | ६७ | पुरुष | सर्वव्यापी परम पुरुष |
| १४ | बुद्धिविधाता | ज्ञान प्रदान करने वाले | ६८ | रक्त | लाल कान्ति वाले प्रभु |
| १५ | चतुर्भुज | चार भुजाओं वाले | ६९ | रुद्रप्रिय | भगवान शिव के अतिप्रिय |
| १६ | देवदेव | देवों के भी देव | ७० | सर्वदेवात्मक | सब देवों की आहुति ग्रहणकर्ता |
| १७ | देवान्तकनाशकारी | दैत्यों का नाश करने वाले | ७१ | सर्वसिद्धान्त | समस्त विद्याओं के मूल |
| १८ | देवव्रत | तपस्या स्वीकारने वाले | ७२ | सर्वात्मन | ब्रह्माण्ड के रक्षक |
| १९ | देवेन्द्रशिखा | इन्द्रादि के रक्षक | ७३ | शाम्भवी | पार्वती नन्दन |
| २० | धार्मिक | धर्म व दान के दाता | ७४ | शशिवर्णम् | चन्द्रमा जैसी शीतल आभा वाले |
| २१ | धूम्रवर्ण | धुएँ जैसे रंग वाले | ७५ | शूर्पकर्ण | सूप के समान बड़े कान वाले |
| २२ | दुर्जय | जिन्हें जीता न जा सके | ७६ | शुभन | परम मङ्गलकारी प्रभु |
| २३ | द्वैमातुर | दो माताओं (पार्वती-मालिनी) वाले | ७७ | शुभगुणकानन | समस्त सद्गुणों के सागर |
| २४ | एकाक्षर | एक अक्षर (प्रणव) मय | ७८ | श्वेत | परम शुद्ध व निष्कलंक |
| २५ | एकदन्त | एक दाँत वाले सत्य स्वरूप | ७९ | सिद्धिदाता | सफलता देने वाले |
| २६ | एकदृष्ट | अद्वितीय दृष्टि वाले | ८० | सिद्धिप्रिय | सिद्धियों के वरदानी |
| २७ | ईशानपुत्र | भगवान शिव के सुपुत्र | ८१ | सिद्धिविनायक | सिद्धियों के नायक |
| २८ | गदाधर | गदा अस्त्र धारण करने वाले | ८२ | स्कन्दपूर्वज | कार्तिकेय के बड़े भ्राता |
| २९ | गजकर्ण | गज के समान कान वाले | ८३ | सुमुख | अति सुन्दर मुख वाले |
| ३० | गजानन | हाथी के मुख वाले | ८४ | सुरेश्वरम | देवताओं के अधिपति |
| ३१ | गजाननेति | गजमुख के नाम से विख्यात | ८५ | स्वरूप | परम सौन्दर्य के प्रेमी |
| ३२ | गजवक्र | हाथी की सूँड वाले | ८६ | तरुण | सदा नवीन व अजर |
| ३३ | गजवक्त्र | गज समान मुखमण्डल | ८७ | उद्दण्ड | अधर्मियों के दण्डदाता |
| ३४ | गणाध्यक्ष | समस्त गणों के अध्यक्ष | ८८ | उमापुत्र | माता उमा के दुलारे |
| ३५ | गणाध्यक्षीण | पिण्डों व नक्षत्रों के स्वामी | ८९ | वक्रतुण्ड | घुमावदार सूँड वाले |
| ३६ | गणपति | समस्त गणों के पालक | ९० | वरगणपति | वरदानों के स्वामी |
| ३७ | गौरीसुत | माता गौरी के पुत्र | ९१ | वरप्रद | मनोकामना पूर्ण करने वाले |
| ३८ | गुणीन | सर्वगुणसम्पन्न प्रभु | ९२ | वरदविनायक | जय व विजय देने वाले |
| ३९ | हरिद्रा | स्वर्ण-पीत कान्ति वाले | ९३ | वीरगणपति | पराक्रमी योद्धा |
| ४० | हेरम्ब | दीन-दुखियों के रक्षक | ९४ | विद्यावारिधि | ज्ञान के अथााह सागर |
| ४१ | कपिल | धूसर/भूरे वर्ण वाले | ९५ | विघ्नहारक | रुकावटों को हरने वाले |
| ४२ | कवीश | विद्वानों और कवियों के ईश | ९६ | विघ्नहर्ता | संकट मोचन |
| ४३ | कीर्ति | यश और प्रतिष्ठा प्रदाता | ९७ | विघ्नराज | विघ्नों के नियन्ता |
| ४४ | कृपालु | परम दयालु भगवान | ९८ | विघ्नराजेन्द्र | बाधाओं के महाराजा |
| ४५ | कृष्णपिङ्गाक्ष | पीली-काली आँखों वाले | ९९ | विघ्नविनाशन | बाधाओं को समूल नष्ट करने वाले |
| ४६ | क्षमाकरम | क्षमा के परम धाम | १०० | विघ्नेश्वर | विघ्नों के ईश्वर |
| ४७ | क्षिप्र | शीघ्र प्रसन्न होने वाले | १०१ | विकट | विराट और विकराल |
| ४८ | लम्बकर्ण | विशाल कानों वाले | १०२ | विनायक | सबके परम नायक |
| ४९ | लम्बोदर | विशाल उदर वाले | १०३ | विश्वमुख | सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के मुख |
| ५० | महाबल | अनन्त बलशाली | १०४ | विश्वराज | जगत के सम्राट |
| ५१ | महागणपति | देवाधिदेव गणपति | १०५ | यज्ञकाय | यज्ञों को स्वीकारने वाले |
| ५२ | महेश्वरम् | सृष्टि के महेश्वर | १०६ | यशस्करम | कीर्ति व सौभाग्य प्रदाता |
| ५३ | मङ्गलमूर्ति | कल्याण के साक्षात् विग्रह | १०७ | यशस्वी | सर्वत्र पूजित प्रभु |
| ५४ | मनोमय | मन को जीतने वाले | १०८ | योगाधिप | योग व ध्यान के स्वामी |
चतुर्थी तिथियों का विशेष माहात्म्य
शास्त्रों में भगवान गणेश की उपासना हेतु चतुर्थी तिथि को सर्वोत्तम माना गया है:
श्री गणेश चालीसा (सार्थ - अर्थ सहित)
जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल ।
विघ्न हरण मङ्गल करण, जय जय गिरिजालाल ॥
जय जय जय गणपति गणराजू । मंगल भरण करण शुभ काजू ॥
जय गजबदन सदन सुखदाता । विश्व विनायक बुद्धि विधाता ॥ १ ॥
वक्रतुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन । तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ॥
राजित मणिमुक्तन उर माला । स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ॥ २ ॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं । मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजे । चरण पादुका मुनि मन राजे ॥ ३ ॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता । गौरी ललन विश्व-विख्याता ॥
ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे । मूषक वाहन सोहत द्वारे ॥ ४ ॥
कहौं जन्म शुभ-कथा तुम्हारी । अति विचित्र अति बुद्धि उदारी ॥
एक समय गिरिराज कुमारी । पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी ॥ ५ ॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा । तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा ॥
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी । बहुविधि सेवा करी तुम्हारी ॥ ६ ॥
अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा । मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ॥
मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला । बिना गर्भ धारण यहिकाला ॥ ७ ॥
गणपति गणनायक मन बहलावन । सुर नर मुनि जन के सुख भावन ॥
जब सब देव मिलन तुम आए । लखि शनीचर हिय सकुचाए ॥ ८ ॥
शनि की नज़र पड़ी जब जाई । गिर गयो शीश भूमि पर आई ॥
मचि गयो सकल स्वर्ग हड़कम्पा । माता भई विकल अति रम्भा ॥ ९ ॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये । काटि शीश गज को ले आये ॥
धड़ ऊपर स्थित कर दीन्हो । प्राण वायु संजीवन कीन्हो ॥ १० ॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे । प्रथम पूज्य वर तुमको दीन्हे ॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा । पृथ्वी कर प्रदक्षिणा दीन्हा ॥ ११ ॥
चले षडानन भरमि भुलाई । रचे बैठि तुम बुद्धि उपाई ॥
माता-पिता चरण धरि लीन्हे । तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हे ॥ १२ ॥
धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे । नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे ॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई । शेष सहसमुख सकै न गाई ॥ १३ ॥
मैं मतिहीन मलीन दुखारी । करहुँ कृपा भव-भय-हारी ॥
जयति जयति जय मूषक वाहक । जयति भवानी सुवन सुखदायक ॥ १४ ॥
संवत संवत सहस्र दस, आठ सतासी जान ।
ऋषि पंचमी रवि सुदिन, पूर्ण चालीसा जान ॥
नित नेम उठि प्रात ही, पाठ करै चालीसा ।
ताके घर सुख-सम्पत्ति, नित देहिं गौरीशा ॥
श्री गणपति अथर्वशीर्ष (सार्थ - वेद मन्त्र)
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः । व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम् । रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥
रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् । रक्तगन्धानुलिप्ताङ्
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