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ऋषि याज्ञवल्क्य — ब्रह्मज्ञान की खोज वैदिक भारत का वह समय था, जब राजमहलों से अधिक महत्त्व ऋषियों की कुटियों का था। नगरों में राजाओं का शासन था, लेकिन मनुष्यों के हृदय पर शासन ज्ञान का था। दूर-दूर से विद्वान, तपस्वी और साधक एक-दूसरे से मिलने आते और जीवन के सबसे बड़े प्रश्नों पर विचार करते—
मैं कौन हूँ? यह संसार क्या है? मृत्यु के बाद क्या है? और वह सत्य क्या है जिसे जान लेने के बाद कुछ और जानना शेष नहीं रहता? इसी युग में एक महान ऋषि हुए—याज्ञवल्क्य। याज्ञवल्क्य साधारण विद्वान नहीं थे। वे वेदों के ज्ञाता थे, यज्ञों के मर्म को जानते थे और सबसे बढ़कर ब्रह्मविद्या के साधक थे। उनका व्यक्तित्व तेजस्वी था और वाणी अत्यंत स्पष्ट। वे किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करते थे कि परंपरा में ऐसा कहा गया है। वे सत्य को स्वयं जानना चाहते थे। उसी समय मिथिला के राजा जनकभी ज्ञान के महान प्रेमी थे। उनका राजदरबार केवल राजनीति और राज्य के कार्यों के लिए प्रसिद्ध नहीं था। वहाँ ऋषि-मुनि और ब्रह्मज्ञानी एकत्र होते, कठिन प्रश्न पूछे जाते और सत्य की खोज में गहन संवाद होते। एक दिन राजा जनक ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। देश के अनेक प्रसिद्ध ब्राह्मण और ऋषि वहाँ पहुँचे।
राजा ने घोषणा की— “जो इस सभा में वेद और ब्रह्मविद्या का सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता सिद्ध होगा, उसे एक हजार गायें पुरस्कार में दी जाएँगी। प्रत्येक गाय के सींग पर शुद्ध सोना बाँधा गया है।” सभा में सन्नाटा छा गया। इतने बड़े पुरस्कार को देखकर सभी विद्वान एक-दूसरे की ओर देखने लगे। लेकिन कोई भी आगे बढ़कर यह कहने को तैयार नहीं था कि वह सबसे श्रेष्ठ है। तभी याज्ञवल्क्य उठे। उन्होंने अपने शिष्यों की ओर देखा और शांत स्वर में कहा— “इन गायों को हमारे आश्रम ले जाओ।” सभा में हलचल मच गई। एक विद्वान ने व्यंग्य से पूछा— “याज्ञवल्क्य! क्या तुम्हें लगता है कि तुम हम सबमें सबसे बड़े ज्ञानी हो?” याज्ञवल्क्य मुस्कुराए। “मैंने ऐसा नहीं कहा। मुझे गायों की आवश्यकता है, इसलिए उन्हें ले जा रहा हूँ।” अब प्रश्नों की बौछार शुरू हो गई। एक के बाद दूसरा विद्वान याज्ञवल्क्य से प्रश्न करने लगा। वे यज्ञ, देवताओं, प्राण, मृत्यु और आत्मा के विषय में पूछते रहे। याज्ञवल्क्य शांत भाव से उत्तर देते रहे। फिर सभा में एक स्त्री उठी। वह थीं गार्गी—अत्यंत विदुषी और निर्भीक ब्रह्मवादिनी। गार्गी ने याज्ञवल्क्य की ओर देखकर कहा— “हे याज्ञवल्क्य! मैं आपसे कुछ प्रश्न करना चाहती हूँ।” “पूछो, गार्गी।” गार्गी ने पूछा— “यह पृथ्वी किसमें स्थित है?” “जल में।” “जल किसमें स्थित है?” “वायु में।” “वायु किसमें स्थित है?” याज्ञवल्क्य उत्तर देते गए। गार्गी के प्रश्न एक के बाद एक गहरे होते गए। वह उस अंतिम सत्य तक पहुँचना चाहती थीं जिसके आगे कोई दूसरा प्रश्न शेष न रहे। अंततः याज्ञवल्क्य ने उस अविनाशी ब्रह्म की ओर संकेत किया, जो सबको भीतर से धारण करता है, लेकिन स्वयं किसी दूसरे के द्वारा धारण नहीं किया जाता। गार्गी कुछ क्षण मौन रहीं। फिर उन्होंने सभा की ओर देखकर कहा— “जिस ज्ञान को पाने के लिए हम सब यहाँ आए हैं, उस ज्ञान में याज्ञवल्क्य अत्यंत महान हैं।” सभा शांत हो गई। लेकिन याज्ञवल्क्य की जीवन-यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई थी। उनके सामने अभी सबसे बड़ा प्रश्न था—क्या संसार की सारी संपत्ति मनुष्य को वह दे सकती है जिसकी उसे सबसे अधिक आवश्यकता है? इस प्रश्न का उत्तर उन्हें अपने ही घर में मिलने वाला था। उनकी पत्नी मैत्रेयी साधारण गृहिणी नहीं थीं। उन्हें धन-संपत्ति से अधिक सत्य और आत्मज्ञान में रुचि थी। एक दिन याज्ञवल्क्य ने निश्चय किया कि अब वे गृहस्थ जीवन छोड़कर संन्यास का मार्ग अपनाएँगे। उन्होंने मैत्रेयी को बुलाया। “मैत्रेयी,” उन्होंने कहा, “मैं अब यह गृहस्थ जीवन छोड़ना चाहता हूँ। जो संपत्ति है, उसे तुम्हारे और कात्यायनी के बीच बाँट देना चाहता हूँ।” मैत्रेयी कुछ देर तक मौन रहीं। फिर उन्होंने धीरे से पूछा— “स्वामी, यदि मुझे इस पूरी पृथ्वी की संपत्ति मिल जाए, तो क्या मैं उससे अमर हो सकती हूँ?” याज्ञवल्क्य ने कहा— “नहीं, मैत्रेयी। धन से संसार का सुख मिल सकता है, लेकिन अमरत्व नहीं।” मैत्रेयी ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा— “तो फिर मैं उस धन का क्या करूँ जिससे अमरत्व नहीं मिल सकता? मुझे वह बताइए जिससे अमरत्व प्राप्त हो।” याज्ञवल्क्य प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कहा— “मैत्रेयी! तुमने आज मेरे हृदय को प्रसन्न कर दिया। आओ, मैं तुम्हें वह ज्ञान बताता हूँ जिसके बाद संसार की किसी वस्तु को अलग से जानने की आवश्यकता नहीं रहती।” और फिर याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को आत्मा का रहस्य समझाना आरम्भ किया। “पति इसलिए प्रिय नहीं है कि वह केवल पति है। वह आत्मा के कारण प्रिय है। पत्नी, पुत्र, धन, देवता, संसार—सब आत्मा के कारण प्रिय हैं। इसलिए बाहरी वस्तुओं को खोजने के बजाय उस आत्मा को खोजो जो सबके भीतर विद्यमान है।” मैत्रेयी ध्यान से सुनती रहीं। याज्ञवल्क्य ने आगे कहा— “जैसे नमक की एक डली पानी में घुल जाने के बाद दिखाई नहीं देती, लेकिन पानी के प्रत्येक भाग में उसका स्वाद रहता है, वैसे ही आत्मा समस्त अस्तित्व में व्याप्त है।” मैत्रेयी के मन में अनेक प्रश्न उठे। संसार, आत्मा और मुक्ति का रहस्य उनके सामने धीरे-धीरे खुलने लगा। याज्ञवल्क्य जानते थे कि धन समाप्त हो सकता है, शरीर समाप्त हो सकता है, संबंध बदल सकते हैं और संसार की वस्तुएँ नष्ट हो सकती हैं—लेकिन आत्मा नष्ट नहीं होती। यही वह ज्ञान था जिसकी खोज में उन्होंने अपना जीवन लगाया था। और यही वह ज्ञान था जिसे आगे चलकर उनके संवादों ने उपनिषदों की अमर परंपरा में स्थान दिया। याज्ञवल्क्य की कहानी केवल एक ऋषि की कहानी नहीं है। यह उस मनुष्य की कहानी है जो संसार के बीच रहते हुए भी उस सत्य की खोज करता है जो संसार से परे है।

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