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‘अन्धा उल्लू’ ईरानी साहित्य की उन महान कृतियों में से एक है, जिन्हें आधुनिक विश्व साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है। इसके लेखक सादिक़ हिदायत ने इस उपन्यास के माध्यम से मनुष्य के भीतर छिपे अँधेरे, अकेलेपन, निराशा, भय, मृत्युबोध और अस्तित्वगत संकट को अत्यन्त गहन एवं प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। मूल फ़ारसी में लिखे गए इस उपन्यास का हिन्दी रूपान्तरण प्रसिद्ध कथाकार नासिरा शर्मा ने किया है।

यह उपन्यास केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि आधुनिक मनुष्य के उस मानसिक संसार का चित्रण है जिसमें वह अपने चारों ओर मौजूद संवेदनहीनता, असंगति और सामाजिक दबावों के बीच स्वयं को अकेला और असहाय अनुभव करता है। उपन्यास की दुनिया कभी इतनी विचित्र और अतियथार्थवादी प्रतीत होती है कि पाठक को वह अपने जीवन से बहुत दूर लगती है, लेकिन इसके पात्रों की प्रतिक्रियाएँ, भय, इच्छाएँ और मानसिक संघर्ष धीरे-धीरे उसे अपने ही भीतर का परिचित संसार दिखाई देने लगते हैं।

उपन्यास की विशेषता

‘अन्धा उल्लू’ का सबसे बड़ा आकर्षण उसका मनोवैज्ञानिक और अस्तित्ववादी स्वरूप है। लेखक बाहरी घटनाओं की अपेक्षा पात्र के भीतर चलने वाले विचारों और भावनाओं को अधिक महत्त्व देता है। उसके मन में उठने वाले प्रश्न, स्मृतियाँ, भय, कल्पनाएँ और मृत्यु के विचार लगातार कथा को एक गहरे मानसिक धरातल पर ले जाते हैं। उपन्यास में संसार को देखने का दृष्टिकोण सामान्य यथार्थवादी कथा से बिल्कुल अलग है। वास्तविकता, स्वप्न और भ्रम एक-दूसरे में इस प्रकार घुल-मिल जाते हैं कि पाठक के लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन-सी घटना वास्तव में घट रही है और कौन-सी पात्र के मानसिक संसार की उपज है। यही विशेषता इसे आधुनिकतावादी और अतियथार्थवादी साहित्य की महत्त्वपूर्ण कृति बनाती है। ‘अन्धा उल्लू’ के केन्द्र में एक ऐसा व्यक्ति है जो अपने चारों ओर की दुनिया से गहरे स्तर पर कट चुका है। वह लोगों के बीच होते हुए भी अकेला है। उसके भीतर संवाद करने की इच्छा है, लेकिन उसे समझने वाला कोई नहीं मिलता। उसका अकेलापन धीरे-धीरे मानसिक यातना का रूप ले लेता है। जीवन के प्रति उसका विश्वास कम होता जाता है और संसार उसे अर्थहीन तथा निराशाजनक दिखाई देने लगता है। लेखक ने इस मानसिक अवस्था को अत्यन्त तीव्रता के साथ प्रस्तुत किया है। उपन्यास में निराशा केवल व्यक्तिगत भावना नहीं रह जाती, बल्कि वह पूरे सामाजिक और मानवीय वातावरण का हिस्सा बन जाती है। पात्र को लगता है कि उसके चारों ओर की दुनिया उसकी स्वतंत्रता और संवेदनशीलता को लगातार दबा रही है। मृत्यु ‘अन्धा उल्लू’ की सबसे महत्त्वपूर्ण विषय-वस्तुओं में से एक है। उपन्यास में मृत्यु केवल जीवन के अन्त के रूप में नहीं आती, बल्कि वह पात्र की चेतना में निरन्तर उपस्थित रहती है। मृत्यु के प्रति आकर्षण, भय और जिज्ञासा उसके विचारों को प्रभावित करते हैं। जीवन और मृत्यु के बीच की सीमा कई स्थानों पर धुँधली दिखाई देती है। इस कारण उपन्यास का वातावरण अत्यन्त गम्भीर, उदास और बेचैन करने वाला बन जाता है। हिदायत ने मृत्युबोध के माध्यम से यह प्रश्न उठाया है कि यदि मनुष्य अपने जीवन में अर्थ, प्रेम और अपनापन अनुभव न कर सके तो उसके लिए जीवन का अर्थ क्या रह जाता है।

स्वप्न और वास्तविकता

‘अन्धा उल्लू’ की कथा में स्वप्न और वास्तविकता का सम्बन्ध अत्यन्त जटिल है। पाठक लगातार ऐसी परिस्थितियों से गुजरता है जहाँ वास्तविक घटनाएँ कल्पना और स्वप्न के साथ मिल जाती हैं। यह शैली लेखक को पात्र की मानसिक स्थिति को अधिक गहराई से प्रस्तुत करने का अवसर देती है। मनुष्य के भीतर जो भय और इच्छाएँ छिपी होती हैं, वे कई बार स्वप्न के रूप में सामने आती हैं। इस प्रकार स्वप्न उपन्यास में केवल मनोरंजन या रहस्य पैदा करने का माध्यम नहीं है, बल्कि पात्र के अन्तर्मन को समझने की कुंजी बन जाता है।

आधुनिक मनुष्य का मानसिक संसार

‘अन्धा उल्लू’ को आधुनिक मनुष्य की मानसिक स्थिति का एक सशक्त दस्तावेज भी माना जा सकता है। आधुनिक जीवन ने मनुष्य को अनेक सुविधाएँ दी हैं, लेकिन इसके साथ ही अकेलापन, असुरक्षा, तनाव और अस्तित्वगत संकट भी बढ़े हैं। उपन्यास में दिखाई देने वाली संवेदनहीन दुनिया आज के पाठक को भी कई स्तरों पर परिचित लग सकती है। मनुष्य भीड़ में रहते हुए भी अकेला हो सकता है और बाहरी रूप से सामान्य दिखाई देते हुए भीतर से गहरे संकट में हो सकता है। इसी कारण ‘अन्धा उल्लू’ केवल अपने समय का उपन्यास नहीं रह जाता। इसके प्रश्न आज भी प्रासंगिक दिखाई देते हैं।

ईरानी साहित्य में स्थान

सादिक़ हिदायत को आधुनिक फ़ारसी साहित्य के प्रमुख साहित्यकारों में गिना जाता है। उन्होंने पारम्परिक कथा-शैली से आगे बढ़कर मनुष्य के मन, सामाजिक विसंगतियों और अस्तित्वगत प्रश्नों को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। ‘अन्धा उल्लू’ उनकी सबसे प्रसिद्ध कृतियों में है और फ़ारसी साहित्य की आधुनिक धारा में इसका विशेष महत्त्व है। इसकी लोकप्रियता केवल ईरान तक सीमित नहीं रही। इसका अनुवाद अनेक भाषाओं में हुआ और विश्व के विभिन्न देशों के पाठकों तक यह कृति पहुँची।

उपन्यास पर प्रतिबन्ध

उपन्यास की अत्यन्त निराशाजनक और मृत्यु-केंद्रित विषय-वस्तु के कारण इसे लेकर विवाद भी रहा। ईरान में इसके प्रसार पर प्रतिबन्ध लगाए जाने की बात साहित्यिक इतिहास में मिलती है। इसके प्रभाव को लेकर भी अनेक चर्चाएँ हुईं। कहा जाता है कि उपन्यास पढ़ने के बाद कुछ पाठकों पर इसका इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने आत्महत्या का प्रयास किया। हालांकि ऐसी घटनाओं और उनके प्रत्यक्ष कारणों को लेकर सावधानीपूर्वक विचार करना आवश्यक है, लेकिन यह निर्विवाद है कि ‘अन्धा उल्लू’ पाठक को मानसिक और भावनात्मक स्तर पर गहराई से प्रभावित करने वाली रचना है।


जीवन परिचय

सादिक़ हिदायत का जन्म 19 फ़रवरी 1903 को ईरान की राजधानी तेहरान में हुआ। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा फ्रांसीसी कैथोलिक विद्यालय सेंट लुईस में हुई। आगे की शिक्षा के लिए वे यूरोप गए। उन्होंने बेल्जियम में इंजीनियरिंग की पढ़ाई आरम्भ की, लेकिन उसे बीच में ही छोड़ दिया और वास्तुकला की शिक्षा के लिए पेरिस चले गए। पेरिस में उन्होंने लगभग चार वर्ष बिताए। बाद में उन्होंने अपनी छात्रवृत्ति छोड़ दी और बिना डिग्री प्राप्त किए तेहरान लौट आए। ईरान लौटने के बाद उन्होंने विभिन्न नौकरियाँ कीं, लेकिन उनका मुख्य झुकाव साहित्य की ओर ही रहा। उन्होंने लगातार लेखन किया और फ़ारसी भाषा एवं साहित्य में आधुनिक संवेदना को स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिदायत ने केवल उपन्यास ही नहीं लिखे, बल्कि कहानियाँ, लघु उपन्यास, नाटक, यात्रा-वृत्तान्त, रेखाचित्र और अन्य साहित्यिक विधाओं में भी योगदान दिया। उन्होंने फ़्रेंच और पहलवी भाषाओं से अनुवाद भी किए। उनकी रचनाओं का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ और उनकी कुछ कृतियों पर फ़िल्में भी बनीं।


सादिक़ हिदायत की प्रमुख रचनाएँ

सादिक़ हिदायत की साहित्यिक रचनाओं का संसार काफी व्यापक है। उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं—


      • हाजी आग़ा
    • बुफ़-ए-कूर — अन्धा उल्लू
    • तप्प-ए-मोरवारीद
    • ज़िन्दे बे गूर — ज़िंदा दफ़न
    • सगे वलगर्द — आवारा कुत्ता
    • सेह क़तरे ख़ून — तीन बूँद लहू
    • परवीन दुख़्तरे सासियान
    • माज़ियार
    • अफ़सान-ए-आफ़रीनश
    • अफ़साने निस्फ़े जहान
    • रूये जाददेह नमनाक

इन रचनाओं में मनुष्य की मानसिक स्थिति, सामाजिक विसंगतियाँ, अकेलापन, मृत्यु, निराशा और जीवन के अर्थ जैसे विषय बार-बार दिखाई देते हैं।


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