वररुचि कात्यायन प्राचीन भारतीय संस्कृत व्याकरण परंपरा के महान आचार्य और पाणिनीय व्याकरण के प्रसिद्ध वार्तिककार माने जाते हैं। उन्होंने पाणिनि की अष्टाध्यायी में दिए गए सूत्रों को स्पष्ट करने, उनके अर्थ को विस्तार देने तथा जहाँ आवश्यक हो वहाँ सूत्रों की कमियों को दूर करने के लिए वार्तिकों की रचना की। पाणिनि के सूत्र अत्यंत संक्षिप्त होने के कारण उनके अर्थ को समझने में वार्तिकों का विशेष महत्व है। कात्यायन के वार्तिकों में पाणिनीय सूत्रों की व्याख्या, समीक्षा, तर्क-वितर्क तथा आवश्यक संशोधन दिखाई देते हैं। उन्होंने अनेक स्थानों पर सूत्रों के गूढ़ अर्थ को स्पष्ट किया और कुछ ऐसे शब्दों की सिद्धि का मार्ग बताया जो केवल मूल सूत्रों से स्पष्ट नहीं होते थे। बाद में पतञ्जलि ने इन्हीं सूत्रों और वार्तिकों के आधार पर प्रसिद्ध महाभाष्य की रचना की। इस कारण पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि को संस्कृत व्याकरण की महान त्रयी के रूप में देखा जाता है। कात्यायन को विभिन्न ग्रंथों में कात्य, पुनर्वसु, मेधाजित् और वररुचि जैसे नामों से भी संबोधित किया गया है। कुछ साहित्यिक स्रोतों में उनका एक नाम श्रुतधर भी मिलता है। उनके जीवनकाल और उनके द्वारा रचित सभी ग्रंथों के संबंध में विद्वानों में पूर्ण मतैक्य नहीं है। वररुचि कात्यायन के नाम से जुड़े ग्रंथों में वार्तिक, वेदसर्वानुक्रमणी और प्रातिशाख्य आदि का उल्लेख मिलता है। हालांकि इन सभी रचनाओं का एक ही कात्यायन से संबंध निश्चित रूप से स्थापित करना कठिन माना जाता है। इसी प्रकार प्राकृतप्रकाश के रचयिता वररुचि को भी पाणिनीय वार्तिककार कात्यायन से अलग व्यक्ति माना जाता है। कात्यायन के वार्तिकों का महत्व केवल व्याकरण तक सीमित नहीं है। इनके माध्यम से प्राचीन भारत की भाषा, शब्दप्रयोग, व्याकरणिक चिंतन और विद्वत् परंपरा की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। संस्कृत व्याकरण के इतिहास में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है और पाणिनीय व्याकरण के अध्ययन में आज भी उनके वार्तिकों का विशेष स्थान है। वररुचि कात्यायन का अध्ययन संस्कृत व्याकरण, पाणिनीय परंपरा, भारतीय भाषाशास्त्र और प्राचीन भारतीय विद्या-परंपरा में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं तथा संस्कृत प्रेमियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।