सनातन स्तोत्र संग्रह
हिन्दु संस्कार
सनातन देव

॥ नामकरणसंस्कारविधिः ॥

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रचयिता: पारंपरिक पाठ संख्या: 1
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नामकरणसंस्कार-विधिः

दशम्यामुत्थाप्य ब्राह्मणान्भोजयित्वा पिता नाम करोति। इचक्षरं चतुरक्षरं वा घोषवदाद्यन्तरन्तस्थं दीर्घाभिनिष्ठानं कृतं कुर्यान्न तद्धितम्‌। अयुजाक्षरमाकारान्त१9स्त्रिये तद्धितम्‌ । शर्म ब्राह्मणस्य वर्म क्षत्रि यस्य गुप्तेति वैश्यस्य । चतुर्थे मासि निष्क्रमणिका । सूर्यमुदीक्षयति तच्चक्षुरिति। इति पारस्करगृह्यसूत्रे प्रथमकाण्डे सप्तदशो कण्डिका ----------------- चतुविधानि नामानि धार्याणि १. देवतानाम २. मासनाम ३. नक्षत्रनाम ४. व्यवहारनामं अथवा प्रसिद्धनाम च । प्रसिद्धनाम्न्येव द्वचक्षरत्र्यक्षरादि विचार: कर्तव्यः जन्मतः एकादशदिने वा यथाचारं नियतदिने वा नामकरणसंस्कारः कार्य: । नियतकालेऽपि भद्रावेधृतिव्यतिपातग्रहणश्राद्वादि दिनं वजेयेत्‌। नियतकाले क्रियमाणे गुरुशुक्रास्तबाल्य़वार्धक्यवक्रातिचारमलमासादि निषेधो नास्ति । नियतकालातिक्रमे तु ज्योतिःशास्त्रोक्ते शुभदिने कार्यम्‌ । यदि जन्मदिवसे समये च जातकर्मसंस्कारो नैव कृतस्तदा जातकर्माप्यनादिष्टप्रायश्चित्तहोमपूवेकं नामकमंणा सहैव कार्यम्‌ । अनुप्राणनवात्सप्राभिमशेनानुमन्त्रणे । कालान्तरेऽपि कुर्वोत आयुष्यकरणं तथा ॥ इति वृद्धोक्तेः। 'अशौचोपरमे कार्य म्‌' --इति विष्णधर्मोत्तरे च । यदि एकादशे दिवसे नामकरणसंस्कारः कतु न शक्यते तदा अष्टादशे, एकोनर्विशे दिने, शतरात्रे व्युष्टे अयने, संवत्सरे गते वा नामकरणसंस्कारो भवति । किन्तु सूतिकाशुद्धिस्तु तस्मिन्नेव दिने कतेव्या । यथा हि प्रचेता:--सुतिका सर्ववर्णानां दशाहेन विशुद्धघति । ऋतौ च न पृथक्‌: धर्मः सर्ववर्णष्वयं विधिः ॥ मनुनाप्युक्तम्‌ -नामधेयं दशम्यां च द्वादश्यां वास्य कारयेत्‌ । पुण्ये तिथौ मुहुर्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते ॥ दशमे दिवसे स्नायाच्छुध्यर्थ सा सबालिका । विधि-विधान पारस्कर का कथन है कि बालक के जन्म से दस रात्रियां बीत जाने के पश्चात्‌ ११वें दिन प्रसूतिका स्थान से सूतिका को लाकर (गोमूत्रादि से शुद्धि करके) तीन ब्राह्मणों को भोजन कराने का सङ्कल्प कर पिता नवजात शिशु का नामकरण संस्कार करे । देवता नाम', मास नाम, नक्षत्र नाम ओर प्रसिद्ध नाम इन चार प्रकार के नामों में से प्रसिद्ध नाम के सम्बन्ध में पारस्कर का कथन है कि यह दो या चार अक्षरों वाला होना चाहिए । पञ्चगव्याभिमन्त्रणम्‌-३७ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुवेरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्‌ । इति गायत्रीमन्त्रेण गोमूत्रं गृहीत्वा वरुणं ध्यायन्‌ ताम्रपात्रे पलाशपत्रपुटे वा स्थापयेत्‌ । तत :-३७ गन्धद्वाराँ दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्‌ । ईश्वरी सर्वेभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्‌ ॥ इति गोमयं संगृह्य अग्नि ध्यायन्स्तत्रेव निदध्यात्‌ । ३ आप्यायस्व समेतु विश्वतः सोम वृष्ण्यम्‌ । भवा वाजस्य सङ्गमे ॥ इति दुग्धं संगृह्य सोमं ध्यायन्स्तत्रेव निदध्यात्‌ । ३ दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभि नो मुखा करत्प्रण आयूणँषि तारिषत्‌ ॥ इति दधि संगृह्य वायु ध्यायन्स्तत्रैव निदध्यात्‌ । 3 तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि धामनामासि । प्रियं देवानामनाधुष्टं देवयजनमसि ॥ इति घृतं संगृह्य रवि ध्यायन्स्तत्रेव निदध्यात्‌ । आचार्य पारस्करने यद्यपि निष्क्रमण-संस्कारको चतुर्थ मासमें करनेके लिये बताया है, किंतु व्यवहारकी सिद्धिके लिये शिष्टजन भविष्योत्तरपुराणके इस वचन--'द्वादशे अहनि राजेन्द्र शिशोर्निष्क्रमणं गृहात्‌' के आधारपर नामकरणसंस्कार के अनन्तर इसे भी सम्पन्न कर लेते हैं ।  इसलिये दोनों संस्कारोंको एक साथ कर लेना चाहिये नामकरण-संस्कारके दिन प्रातः सूतिका पुत्र (पुत्री)-सहित स्नानादिसे पवित्र हो जाय । सूतिकागृह आदिको भी शुद्ध कर लेना चाहिये । नामकरणकर्ता पिता स्वयं भी स्नानादिसे पवित्र होकर स्वच्छ धुले हुए धोती, उत्तरीय (चादर) आदि वस्त्रोंको धारणकर दीप प्रज्वलितकर पवित्र आसनपर पूर्वाभिमुख हो बैठ जाय, आचमन, प्राणायाम आदि कर ले। सभी पूजनादि सामग्रीको यथास्थान रख ले। तदनन्तर ॐ केशवाय, ॐ नारायणाय नमः , ॐ माधवाय नमः , ॐ गोविन्दाय नमः , कर्ता जल से अपने शिर पूजनं सामग्री तथा माता, शिशु के उपर जल छिडक कर  शुद्ध करे - ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥ ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ३  आसन पवित्र करने के मंत्र का विनियोग पढ़कर जल गिराए – ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतलं छन्दः, कूर्मो देवता, आसन पवित्रकरणे विनियोगः। अब आसन पर जल छिड़क कर दायें हाथ से उसका स्पर्श करते हुए आसन पवित्र करने का मंत्र पढ़े – ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका देवि! त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु चासनम्॥ अब तिलक धारण कर  हाथमें कुशाक्षत, जल लेकर निम्न संकल्प करे- प्रतिज्ञा-संकल्प  विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: श्रीमद्धगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीशवेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्ष आर्यावर्तैकदेशे ( यदि काशी हो तो अविमुक्तवाराणसीक्षेत्रे आनन्दवने गौरीमुखे त्रिकण्टकविराजिते महाश्मशाने भगवत्या उत्तरवाहिन्या भागीरथ्या वामभागे ) ““नगरे/ग्रामे/क्षेत्रै षष्टिसंवत्सराणां मध्ये "संवत्सरे “अयने “ऋतौ "मासे "पक्षे ““तिथौ "नक्षत्रे “योगे "करणे ""वासरे “"राशिस्थिते सूर्ये ““राशिस्थिते चन्द्रे शेषेषु ग्रहेषु यथायथाराशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगणविशिष्टे शुभमुहूर्ते “गोत्रः सपत्नीकः “शर्मा” वर्मा/गुप्तोऽहं मम अस्य कुमारस्य बीजगर्भ-समुद्भवैनोनिबर्हणेन बलायुर्वर्चोऽभिवृद्धिव्यवहारसिद्द्रद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं नामकरणसंस्कारं करिष्ये। इस प्रकार कहकर संकल्प-जल छोड़ दे। ( यहाँ गौरीगणपति तथा पंचांगपूजनादि करे )

ब्राह्मणभोजन-संकल्प

इसके बाद कर्ता नामकरण-संस्कारकर्म करनेको अधिकारसिद्धिके लिये हाथमें जल, अक्षत आदि लेकर तीन ब्राह्मणोंको भोजन करानेका निम्न संकल्प करे-- ॐ अद्य “गोत्र “'शर्मा/वर्मा/गुप्तोडह अस्य जातस्य पुत्रस्य नामकरणपूर्वाङ्गतया विहितान्‌ त्रीन्‌ ब्राह्मणान्‌ भोजयिष्ये। ऐसा संकल्पकर ब्राह्मणोंको भोजन कराये या निष्क्रयभूत द्रव्य-दक्षिणा प्रदान करे। पंचगव्य-हवनके लिये अग्निस्थापनका संकल्प तदनन्तर होमका संकल्प करे। कर्ता हाथमें कुश, अक्षत, जल आदि लेकर निम्नलिखित संकल्पवाक्य बोले-- ३» अद्य पूर्वोच्चारितग्रहगुणगणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ““गोत्र: ““शर्मा/वर्मा/गुप्तोञ्हम्‌ अस्मिन्‌ नामकरणकर्मणि पञ्चगव्यादिहोमार्थ पञ्चभूसंस्कारपूर्वकं विधिनामानमग्निस्थापनं करिष्ये। हाथका संकल्पजलादि छोड़ दे। वेदीनिर्माण तथा पंच-भूसंस्कार- तदनन्तर हवनके लिये मिट्टी अथवा बालूसे एक हाथ लम्बीचौड़ी और चार अंगुल ऊँची एक वेदी बनाये और निम्न रीतिसे वेदीका पंच-भूसंस्कार करे (१) तीन पूर्वाग्र कुशाओंसे वेदीको दक्षिणसे उत्तरी ओरतक साफ कर दे। उन कुशोंको ईशानकोणमें फेंक दे। (२) गोबर और जलसे वेदीको दक्षिणसे उत्तरको ओर लीप दे। (३) खुवा अथवा तीन कुशोंके मूलसे वेदीके बीचमें प्रादेशमात्र (अंगुष्ठ और तर्जनीके बीचकी दूरी) लम्बी तीन रेखाएँ दक्षिणसे प्रारम्भकर उत्तरको ओर पश्चिमसे पूर्वको ओर खींचे। (४) उल्लेखन-क्रमसे रेखाओंसे अनामिका और अंगुष्ठके द्वारा मिट्टी निकालकर बायें हाथमें रखता जाय। तीन बार मिट्टी निकालनेके बाद उसको बायें हाथसे दायें हाथमें लेकर ईशानकोणमें फेंक दे। (५) जलद्वारा वेदीको सींच दे। तदनन्तर वेदीमें अग्निकी स्थापना करे। किसी काँस्य अथवा ताम्रपात्रमें या मिट्टीके कसोरेमें स्थित अग्निको वेदीके अग्निकोणमें रखे और इसमेंसे क्रव्यादांश निकालकर नैऋत्यकोणमें डाल दे। तत्पश्चात्‌ अग्निपात्रको स्वाभिमुख करते हुए निम्न मन्त्रसे अग्निको वेदीमें स्थापित करे- अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे। देवाँ२ आ सादयादिह ॥ अग्निकी सुरक्षाके लिये कुछ ईंधन डाल दे। अग्निकी प्रतिष्ठा एवं पूजन-तदनन्तर ३ भूर्भुव स्वः विधिनामाग्ने इहागच्छ इह तिष्ठ सुप्रतिष्ठितो वरदो भव। ऐसा कहकर अग्निको प्रतिष्ठाकर 'ॐ विधिनामाग्नये नमः' इस मन्त्रसे गन्धादि उपचारोंसे अग्निका पूजन कर ले। आचार्य तथा ब्रह्माका वरण-संकल्प-यदि स्वयं होम करनेमें समर्थ हो तो केवल ब्रह्माका वरण करे अन्यथा आचार्य एवं ब्रह्मा दोनोंका निम्न संकल्पसे वरण करे। दाहिने हाथमें त्रिकुश, अक्षत, जल, वरण-सामग्री तथा द्रव्य ग्रहणकर बोले ३% अद्य पूर्वोच्चारितग्रहगुणगणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ““गोत्र “`शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं "राशेः मम पुत्रस्य करिष्यमाणशुद्भ्यर्थपञ्चगव्यपानाङ्गहोमकर्मणि आचार्यब्रह्मणोः वरणं पूजनं च करिष्ये। ऐसा कहकर संकल्प-जल तथा वरणसामग्री उन्हें प्रदान करे तथा हवनको तैयारी (कुशकण्डिका) * करे। प्रणीतापात्रस्थापन -प्रणीतापात्रको वेदीके उत्तर भागमें कुशोंके आसनपर रख दे । कर्मपात्रके जलसे उसे भर दे। तदनन्तर वेदीके चारों ओर यथाविधि कुश बिछाये। 'पात्रासादन-हवनमें प्रयुक्त होनेवाली सभी वस्तुओं तथा पात्रोंको पश्चिमसे पूर्वतक उत्तराग्र अथवा अग्निके उत्तरकी ओर पूर्वाग्र रख ले। पवित्रक बना ले तथा प्रोक्षणीपात्रका संस्कार करे । आज्यस्थालीमें घृत रखकर वेदीके पश्चिम भागमें उत्तरको ओर रख ले । खुवाका सम्मार्जन कर ले। तीन समिधाओंको घीमें डुबोकर मौन होकर प्रजापति देवताके निमित्त अग्निमें छोड़ दे । तदनन्तर प्रोक्षणीके जलको दायें हाथकी अंजलिमें लेकर अग्निके ईशानकोणसे ईशानकोणतक जलधारा दे । पंचगव्य-निर्माण-नामकरणसंस्कारमें दस दिनतकका जननाशौच प्राप्त रहता है तथा सूतकजन्य अशुद्धि रहती है, अत: नामकरणके दिन शुद्धिके लिये पंचगव्यसे सूतिका-गृहका प्रोक्षण, सूतिकाद्वारा पंचगव्यका पान तथा पंचगव्यसे हवन भी किया जाता है। अतः यहाँ संक्षेपमें पंचगव्यनिर्माणकी विधि दी जा रही है-सर्वप्रथम गायत्री मन्त्रके' द्वारा गोमूत्र ग्रहण करके वरुण देवताका ध्यान करते हुए उस गोमूत्रको किसी ताम्रपात्र अथवा पलाशके दोनेमें रख ले। तदनन्तर ३» गन्धद्वारां' इस मन्त्रका पाठ करते हुए गोमय (गोबर) ग्रहण करे और अग्निदेवका ध्यान करते हुए उसी ताम्रपात्र अथवा पलाशपुटकमें रख दे। ॐ आ प्यायस्व०२ मन्त्रसे गोदुग्ध ग्रहणकर सोम (चन्द्रमा)-का ध्यान करते हुए उसी पात्रमें रख दे। पुनः ३» दधिक्राव्णो०* इस मन्त्रसे दधि (दही) ग्रहण करके वायुदेवताका ध्यान करते हुए उसी पात्रमें रख दे। तदनन्तर % तेजोऽसि०* इस मन्त्रसे गोघृत ग्रहणकर सूर्यका ध्यान करते हुए उसी पात्रमें रख दे। अन्तमें ३% देवस्य त्वा०२ मन्त्रसे कुशोदक लेकर हरि (विष्णु)-का ध्यान करते हुए उसी पात्रमें रख दे। पंचगव्यद्रव्योंका प्रमाण एक पल गोमूत्र, उसका आधा गोमय, गोदुग्ध सात पल, दधि तीन पल, गोघृत एक पल तथा एक पल कुशोदक लेना चाहिये ।* पंचगव्यका आलोडन-- ताम्रपात्र अथवा पलाशके दोनेमें स्थित उन द्रव्योंका हरितकुशोंद्वारा निम्न मन्त्रसे आलोडन करना चाहिये- 3७ आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे॥ इस प्रकार पंचगव्य निर्माणकर यथास्थान रख ले और आगेका हवन-कार्य करे। हवन खुवामें घृत लेकर सर्वप्रथम निम्न मन्त्रोंसे आघार एवं आज्यभागको चार आहुतियाँ प्रदान करे। ब्रह्मा कुशासे होताका स्पर्श किये रहे। प्रत्येक आहुतिके बाद शेष घृत प्रोक्षणीपात्रमें डालता जाय-- ९. ३» प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम। २. ३» इन्द्राय स्वाहा, इदमिन्द्राय न मम। ३. ३ अग्नये स्वाहा, इदमग्नये न मम। ४. ३ सोमाय स्वाहा, इदं सोमाय न मम। अनन्वारब्ध व्याहतिहोम -- तदनन्तर निम्न मन्त्रोंसे घृतसे व्याहति होम करे। ब्रह्मा होतासे कुशाका स्पर्श हटा लें। आहुतिशेष घृत प्रोक्षणीपात्रमें छोड़ता जाय। १. ॐ भूः स्वाहा, इदमग्नये न मम। २. ॐ भुवः स्वाहा, इदं वायवे न मम। ३. ॐ स्वः स्वाहा, इदं सूर्याय न मम। पंचगव्यहोम-- तदनन्तर बने हुए पंचगव्यको सामने रख ले और हरित कुशोंद्वारा निम्न मन्त्रोंसे अग्निमें पंचगव्यकी आहुति प्रदान करे-- ( १ ) ३ इरावती धेनुमती हि भूत <सूयवसिनी मनवे दशस्या। व्यस्कभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः स्वाहा । इदं विष्णवे न मम। (२) ३» इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्‌। समूढमस्य पासुरे स्वाहा। इदं विष्णवे न मम। ( ३ ) ३» मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः। मा नो वीरान्‌ रुद्र भामिनो वधी विष्मन्तः सदमित्‌ त्वा हवामहे स्वाहा। इदं रुद्राय न मम। जलका स्पर्श कर ले। (४) ३» शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु नः स्वाहा । इदमद्भयो न मम। (५) ३ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्‌ स्वाहा। इदं सवित्रे न मम। ( ६ ) ॐ प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परिता बभूव। यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयः स्याम पतयो रयीणाम्‌ स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम। प्रायश्‍्चित्तहोम ( पञ्चवारुणहोम )-- पंचगव्य हवनके अनन्तर निम्नलिखित मन्त्रोंसे घतद्वारा स्त्रुवासे प्रायश्चित्त हवन करना चाहिये। शेष घृत प्रोक्षणीपात्रमें डालता जाय । १-३% त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्‌ देवस्य हेडो अव यासिसीष्ठाः। यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषाःसि प्र मुमुरध्यस्मत्स्वाहा, इदमग्नीवरुणाभ्यां न मम। २-३ स त्वं नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ। अव यक्ष्व नो वरुण*रराणो वीहि मृडीक* सुहवो न एधि स्वाहा। इदमग्नीवरुणाभ्यां न मम। ३-३ अयाश्चाग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्त्वमया असि। अया नो यज्ञं वहास्यया नो धेहि भेषजः स्वाहा। इदमग्नये ऽयसे न मम। ४-3» ये ते शतं वरुण ये सहस्त्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेभिर्नो ऽअद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा॥ इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वर्केभ्यश्च न मम। ५-३ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमः श्रथाय। अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा॥ इदं बरुणायादित्यायादितये न मम। तदनन्तर प्रजापति देवताका ध्यानकर मनमें निम्न मन्त्रका उच्चारणकर आहुति दे-- ६-(मौन होकर) ३» प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम। स्विष्टकृत्‌ आहुति इसके बाद ब्रह्माद्वारा कुशसे स्पर्श किये जानेको स्थितिमें (ब्रह्मणान्वारब्ध) निम्न मन्त्रसे घृतद्वारा स्विष्टकृत्‌ आहुति दे- ३% अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इदमग्नये स्विष्टकृते न मम संस्त्रवप्राशन-- हवन पूर्ण होनेपर प्रोक्षणीपात्रसे घृत दाहिने हाथमें लेकर यत्किंचित्‌ पान करे। हाथ धो ले। फिर आचमन करे। मार्जनविधि-- इसके बाद निम्नलिखित मन्त्रद्वारा प्रणीतापात्रके जलसे कुशोंके द्वारा अपने सिरपर मार्जन करे ३% सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु। इसके बाद निम्न मन्त्रसे जल नीचे छोड़े ३» दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्‌ द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः। पवित्रप्रतिपत्ति— पवित्रकको अग्निमें छोड़ दे। पूर्णपात्रदान- पूर्वमें स्थापित पूर्णपात्रमें द्रव्य-दक्षिणा रखकर निम्न संकल्पकर दक्षिणासहित पूर्णपात्र ब्रह्माको प्रदान करे- ३% अद्य नामकरणसंस्कारहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं वृषनिष्क्रयद्रव्यसहितं पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतं “गोत्राय "शर्मणे ब्रह्मणे भवते सम्प्रददे। ब्रह्मा ‘स्वस्ति’ कहकर उस पूर्णपात्रको ग्रहण कर ले। प्रणीताविमोक -- प्रणीतापात्रको ईशानकोणमें उलटकर रख दे। मार्जन पुनः कुशाद्वारा निम्न मन्त्रसे उलटकर रखे गये प्रणीताके जलसे मार्जन करे ३ आपः शिवाः शिवतमाः शान्ताः शान्ततमास्तास्ते कण्वन्त भेषजम्‌। उपयमन कशोंको अग्निमें छोड़ दे। बर्हिहोम-- तदनन्तर पहले बिछाये हुए कुशाओंको जिस क्रमसे बिछाये गये थे, उसी क्रमसे उठाकर घृतमें भिगोये और निम्न मन्त्रसे स्वाहाका उच्चारणकर अग्निमें डाल दे-- ३» देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित। मनसस्पत इमं देव यज्ञः स्वाहा वाते धाः स्वाहा। कुशमें लगी ब्रह्मग्रन्थिको खोल दे। सूतिकाद्वारा पंचगव्यका पान हवनके अनन्तर हुतशेष (हवनसे बचे हुए) पंचगव्य (ब्रह्मकूर्च)मेंसे थोड़ा पंचगव्य सूतिकाको पान करनेके लिये देना चाहिये। वह दाहिने हाथके ब्राह्मतीर्थ अथवा पलाशके दोनेमें लेकर तीन बार पंचगव्यका प्राशन करे । तदनन्तर पंचगव्य छिड़ककर प्रसवगृहको शुद्ध कर लेना चाहिये। सूतिकाका सूतिकागूहसे बाहर आना अभीतक सूतिका प्रसवगृहमें ही स्थित थी, अब उसे पूजन तथा नामकरणके लिये बाहर पूजास्थलमें आना है। सूतिकागूहसे बाहर आनेके लिये कई देशाचार हैं, एक आचारके अनुसार यह विधि है कि हवनकार्यके लिये वृणीत ब्रह्मा गन्धाक्षतपुष्प आदिसे सरुवाका पूजनकर उससे सूतिकाका स्पर्श कराकर बाहर लाते हैं और वह बालकको गोदमें लेकर अग्निको प्रदक्षिणाकर पतिके वामभागमें बैठ जाती है और गणेशादि देवोंको प्रणामकर पुष्प निवेदित करती है। बालकके नामकरणकी विधि शुभलग्न एवं मुहूर्तके आनेपर श्वेत नवीन वस्त्र बिछाकर उसपर कुमकुम आदिके द्वारा अथवा पीपलके पत्तेपर कुमकुम आदिके द्वारा पाँच नामोंको लिखे-   पहला नाम--अपने कुलदेवतासे सम्बद्ध होना चाहिये । दूसरा नाम--कृष्ण, अनन्त, अच्युत, चक्रधर, वैकुण्ठ, जनार्दन, उपेन्द्र, यज्ञपुरुष, वासुदेव, हरि, योगीश तथा पुण्डरीक--इन बारह नामोंसे जो अभीष्ट हो, एक नाम रखना चाहिये। तीसरा नाम-अवकहडाचक्रके अनुसार नक्षत्रसे सम्बद्ध नाम रखना चाहिये। चौथा नाम- व्यावहारिक नाम रखना चाहिये। पाँचवाँ नाम--जो अपनेको प्रिय हो, वह नाम रखना चाहिये। प्रतिष्ठा * ॐ भूर्भुवः स्वः बालकनामानि सुप्रतिष्ठितानि भवन्तु ऐसा कहकर नामोंको प्रतिष्ठा करे और गन्धादिसे उनका पूजन कर ले। ब्राह्मणका नाम शर्मान्त, क्षत्रियका वर्मान्त, वैश्यका गुप्तान्त और शूट्रका दासान्त होना चाहिये। नाम दो या चार अक्षरका सुखपूर्वक उच्चारण करनेयोग्य सार्थक होना चाहिये। कन्याका नाम विषमाक्षर होना चाहिये। नामांकित वस्त्र या अश्वत्थ (पीपल) -पत्रद्वारा शंखको लपेटे। इसके बाद पूर्वमुख बालकके दाहिने कानमें पिता अथवा आचार्यके द्वारा *““शर्मासि दीर्घायुर्भव'-इस प्रकारसे शंखके माध्यमसे नामोंका तीन बार श्रवण कराना चाहिये। बालकके कानमें नाम कहनेके बाद निम्नलिखित मन्त्रका पाठ पिताको करना चाहिये ३ अङ्गादङ्कात्सम्भवसि हृदयादधिजायसे। आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम्‌॥ बालकद्वारा ब्राह्मणोंको प्रणाम करवाना चाहिये तथा ब्राह्मण उसे आशीर्वाद प्रदान करें । तदनन्तर आगे दी गयी विधिके अनुसार निष्क्रमणसंस्कार करे।          
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