Jabala Upanishad | जाबालोपनिषत्  PDF

Jabala Upanishad | जाबालोपनिषत् PDF

Yagyavalkya Rishi

Author Yagyavalkya Rishi
Editor Dhiraj Sharma
Publisher epustakalaya.com (2026)
Categories Veda Upanishad
Languages Sanskrit
File Size 1.04 MB
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Description

जाबाला उपनिषत् एक समय देवताओं के गुरु बृहस्पति ने महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछा—“वह कौन-सा स्थान है जहाँ परम सत्य और ब्रह्म का निवास माना जाता है?” याज्ञवल्क्य ने बताया—“कुरुक्षेत्र और अविमुक्त क्षेत्र अत्यंत पवित्र हैं। अविमुक्त अर्थात् काशी में मृत्यु के समय भगवान रुद्र जीव को तारक-ब्रह्म का ज्ञान प्रदान करते हैं। उस ज्ञान के द्वारा जीव मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर अमृतत्व और मोक्ष को प्राप्त करता है।” फिर ऋषि अत्रि ने प्रश्न किया—“जो अनन्त और अव्यक्त आत्मा है, उसे मैं कैसे जान सकता हूँ?” याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया—“उस आत्मा का ध्यान करो। वह अविमुक्त में प्रतिष्ठित है। अपने भीतर उस स्थान को खोजो जहाँ इन्द्रियों के दोषों को रोका और पापों का नाश किया जाता है। भ्रूमध्य का ध्यान करते हुए उस परम आत्मा का चिन्तन करो।” इसके बाद कुछ ब्रह्मचारियों ने पूछा—“गुरुदेव! अमृतत्व प्राप्त करने के लिए कौन-सा जप करना चाहिए?” याज्ञवल्क्य ने कहा—“शतरुद्रीय मन्त्र का जप करो। इसके द्वारा मनुष्य अमृतत्व की ओर अग्रसर होता है।” फिर राजा जनक ने याज्ञवल्क्य से कहा—“भगवन्! मुझे संन्यास का मार्ग बताइए।” याज्ञवल्क्य ने समझाया—“मनुष्य पहले ब्रह्मचर्य का पालन करे, फिर गृहस्थ बने, उसके बाद वानप्रस्थ और अंत में संन्यास ग्रहण करे। लेकिन यदि किसी के हृदय में संसार के प्रति सच्चा वैराग्य जाग जाए, तो वह पहले के आश्रमों को छोड़कर भी सीधे संन्यास ले सकता है।” संन्यासी का जीवन कैसा होना चाहिए? याज्ञवल्क्य बताते हैं—“उसे मोह, ममता, संग्रह और अहंकार छोड़ देना चाहिए। वह शुद्ध जीवन जिए, भिक्षा से शरीर का पालन करे और सुख-दुःख तथा लाभ-हानि में समान रहे।” अंत में परमहंस संन्यासी का वर्णन आता है। वह बाहरी वस्तुओं, पद, प्रतिष्ठा और संग्रह का त्याग कर देता है। उसका कोई निश्चित घर नहीं होता। वह कभी मंदिर में, कभी वृक्ष के नीचे, कभी नदी के किनारे या किसी शांत स्थान में रहता है। उसका मन संसार में नहीं, बल्कि आत्मा और ब्रह्म के चिन्तन में लगा रहता है। इस प्रकार जाबालोपनिषद् हमें बताता है कि मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य केवल संसार में सुख प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित परमात्मा को पहचानना और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होना है।

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