সনাতন স্তোত্র মঞ্জরী
শ্রেণী
সনাতন দেব

॥ বিশষমন্ত্রপুষ্পম্ ॥

॥ विशषमन्त्रपुष्पम् ॥
রচয়িতা: পারম্পরিক পাঠ সংখ্যা: 1
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हरि: ॐ अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजं होतारं रत्नधातमम्  ॥ ( ऋग्वेद ) हरि: ॐ इषे त्वोर्जे त्वा वायवस्थोवायवस्थ देवो वः सविता. ती प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे। ( यजुर्वेद ) हरि: ॐ अग्न आयाहि वीतये गृह्णानो हव्यदातये, निहोता सत्सि वर्हिषि । (सामवेद) हरि: ॐ शन्नो देवीरभिष्टये आपो भवन्तु पीतये शंयोर भिस्श्रवन्तु नः। (अथर्ववेद) ओमित्यग्रे व्याहरेत्, नम इति पश्चात्, नारायणायेत्युपरिष्टात्, ॐ इत्येकाक्षरं, नम इति द्वे अक्षरे, नारायणायेति पञ्चाक्षराणि, एतद्वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदं, यो ह वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदमध्येति, अनपब्रुव: सर्वमायुरेति, विन्दते प्राजापत्यं रायस्पोष गोपत्यं ततोऽमृतत्वमश्नुते इति, य एवं वेद, इत्युपनिषत् ।(सा.वे. शिरसि नारायणोपनिषत् ) अथात: समयाचारिकान् धर्मान् व्याख्यास्यामः । धर्मज्ञसमयः । प्रमाणं वेदाश्च । चत्वारो वर्णा: ब्राह्मण-क्षत्रीय-वैश्य-शूद्रास्तेषां पूर्व: पूर्वो जन्मत: श्रेयान् (धर्मसूत्र) अथ कर्माण्याचाराद्यानि गृह्यन्ते । उदगयनपूर्वपक्षाहपुण्याहेषु कार्याणि यज्ञोपवीतिना प्रदक्षिणम् । (गृहसूत्रम्) अथातो धर्मजिज्ञासा । अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।('जै.व्या.' सूत्र पू.उ. मीमांसा) विशेष मन्त्र पुष्प - ३ नमस्तस्मै वराहाय लीलयोद्धरते महीम् । खुरमध्यगतो यस्य मेरु: कनकणायते ॥( वराहपुराण ) इच्छामो हि महाबाहुं रघुवीरं महाबलम् । गजेन महतायान्तं रामं छत्रावृताननम् ॥२॥ तं दृष्ट्वा शत्रुहन्तारं महर्षीणां सुखावहम् । बभूव हृष्टा वैदेही भर्तारं परिषस्वजे ॥(वा . रामायण ) तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं चतुर्भुजं शङ्खगदाधुदायुधम् । श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोभि-कौस्तुभं पीताम्बरं सान्द्रपयोदसौभगम्महार्हवैडुर्यकिरीटकुण्डलत्विषा परिष्वक्तसहस्रकुन्तलम् । उद्दामकांच्यंगदकङ्कणादिभिर्विरोचमानं वसुदेव ऐक्षत ॥५॥       तासामाविरभूच्छौरि: स्मयमानमुखम्बुजः।  जमाल पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथ: ॥६॥                                                                  (श्रीमद्भागवत) एष नारायण: श्रीमान् क्षीरार्णवनिकेतनः । नागपर्यंकमुत्सृज्य ह्यागतो मथाम्प्रीम् ॥७॥ अहो वीर्यमहो शौर्यमहो बाहुपराक्रमम् । नारसिंहं परं दैवमहो बलमहो बलम् ॥८॥ वैकुण्ठे तु परे लोके श्रिया सार्द्ध जगत्पति: । आस्ते विष्णुरचिन्त्यात्मा भक्तैर्भागवतै: सह ॥९॥ मायावी परमानन्दं त्यक्त्वा वैकुण्ठमुत्तमम् । स्वामिपुष्करिणीतीरे रमया सह मोदते ॥१०॥ मुक्तिदश्च मुमुक्षूणां सर्वेषां सर्वकामदः । क्रीडार्थ लोकरक्षार्थं वसाम्यत्र श्रिया सह ॥११॥ वेङ्कटाद्रिसमं स्थानं ब्रह्माण्डे नास्ति किंचन । वेङ्कटेशसमो देवो न भूतो न भविष्यति ।१२॥                                                (वेङ्कटेश माहात्म्य) वपापरिमलोल्लासवासिताधरपल्लवम् मुखं वरदराजस्य मुग्धस्मितमुपास्महे ॥१॥                                           (श्रीहस्तिगिरि माहात्म्य) फाल्गुने मासि पूर्णायामुत्तरद्धेन्दुवासरे। गोविन्दराजो भगवान् प्रादुरासीन्महामुनिः ॥१४॥ कदा पुनः शंखरथाङ्गकल्पकध्वजारविन्दाङ्कुशवज्रलाञ्छनम् । त्रिविक्रम ! त्वच्चरणाम्बुजद्वयं मदीयमूर्धानमलङ्करिष्यति ॥१५॥                                                                     (स्तोत्ररत्न) कस्तूरी कलितोर्ध्वपुण्ड्रतिलकं कर्णान्तलोलेक्षणं          मुग्धस्मेरमनोहराधरदलं मुक्ताकिरीटोज्ज्वलम् । पश्यन्मानसपश्यतोहररुचिं पर्यायपंकेरुहं श्रीरङ्गाधिपते: कदा नु वदनं सेवेय भूयोऽप्यहम् ॥१६॥                                                     (श्रीरङ्गनाथ स्तोत्रम्) अखिल - भुवन - जन्म - स्थेमभङ्गादिलीले            विनतविविधभूतवातरक्षकदीक्षे। श्रुति - शिरसि विदीप्ते ब्रह्मणि श्रीनिवासे,           भवतु मम परस्मिन् शेमुषी भक्तिरूपा ॥१७॥ पाराशर्यवचस्स धामपनिषदुग्धाब्धिमध्योद्धृतां          संसाराग्निविदीपनव्यपगतप्राणात्मसञ्जीवनीम् । पूर्वाचार्यसुरक्षिता बहुमतिव्याघातदूरस्थितां आनीतान्तु निजाक्षरैस्सुमनसो भौमा: पिवन्त्वन्वहम् ॥१८॥ (श्रीभाष्य)  पितेव त्वत्प्रेयान् जननि परिपूर्णागसि जने            हितस्रोतोवृत्त्या भवति च कदाचित् कलुषधीः । किमेतन्निर्दोषः क इह जगतीति त्वमुचितै: उपायैर्विस्मार्य स्वजनयसि माता तदसि नः ॥१९॥                                                              (श्रीगुणरत्नकोश:) जयति सकलविद्यावाहिनीजन्मशैल:                 जनिपथपरिवृत्तिश्रान्तविश्रान्तिशाखी । निखिलकुमतिमायाशर्वरीवालसूर्य: निगमजलधिवेलापूर्णचन्द्रो यतीन्द्रः ॥२०॥                                                                (य. सप्तति) नम: प्रणवशोभितं नवकषायखण्डाम्बरं           त्रिदण्डपरिमण्डितं त्रिविधतत्त्वनिर्वाहकम् । दयांचितदृगंचलं दलितवादिवाग्वैभवं            शमादिगुणसागरं शरणमेमि रामानुजम् ॥२१॥                                                                      (मुक्तकम्) गृहाप उपवीतिनमूर्ध्वपुण्ड्रवन्तं त्रिजगत्पुण्यफलं त्रिदण्डहस्तम् । शरणागतसार्थवाहमीडे शिखया शेखरिणं पतिं यतीनाम् ॥२२॥  सुशङ्खचक्रलाञ्छनस्सदूर्ध्वपुण्ड्रमण्डित -           सुकण्ठलग्नसत्तुलस्यनर्घपद्यमालिका। सितान्तरीसोत्तरीय यज्ञसूत्रशोभितो             ममाविरस्तुमानसेगुरूस्तु वेङ्कटेश्वरः ॥२३॥ नमज्जनस्य चित्त भित्ति भक्ति-चित्र-तूलिका भवाहिवीर्यभञ्जने नरेन्द्रमन्त्रयन्त्रणा। प्रपन्नलोककैरवप्रसन्नचारुचन्द्रिका शठारिहस्तमुद्रिका हठात् धुनातु व तम: ॥२४॥                                                      (वकुलाभरणाष्टक ) भरताय परं नमोऽस्तु तस्मै प्रथमोदाहरणाय भक्तिभाजाम् । यदपज्ञमशेषत: पृथिव्यां प्रथितो राघवपादुकाप्रभाव: ॥२५॥ (पादुका सहस्रम्)   नाहं विप्रो न च नरपतिर्नैव वैश्या न शूद्रो नो वा वर्णी न च गृहपतिर्नो वनस्थो यतिर्वा । किन्तु प्रोद्यन्निखिलपरमानन्दपूर्णामृताब्धे          लक्ष्मीभर्तुःपदकमलयोर्दासदासानुदासः ॥२६॥ श्रीनगर्या महापूर्यम्रपर्युत्तरेतटे । श्रीतिंत्रिणीमूलधाम्नि (श्री) शठकोपाय मङ्गलम् ॥२७॥                                                                     (मङ्गलाष्टक) सुगन्धवल्ली शतपत्रजाती सुवर्णचम्पावकुलोद्भवानि । ककम्) गृहाण देवेश मयार्पितानि प्रभो ! हरे ! श्रीतुलसीदलानि ॥
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