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सनातन देव

सम्पूर्ण तर्पण विधि ( देव, ऋषि और पितृतर्पण )

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रचयिता: पारंपरिक पाठ संख्या: 2
लिपि छनोट (Select Script): देवनागरी (संस्कृत) English (Roman) தமிழ் తెలుగు ಕನ್ನಡ ગુજરાતી বাংলা
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सम्पूर्ण तर्पण विधि
(देव, ऋषि और पितृतर्पण)
प्रारम्भिक तैयारी एवं संकल्प
आसन व स्थिति: पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। दाहिना घुटना जमीन पर लगाएँ। स्थिति: सव्य होकर (जनेऊ और अंगोछा बाएँ कंधे पर रखकर दायें हाथ के नीचे)। तिलक व शिखा: गायत्री मंत्र से शिखा बाँधें, भाल पर तिलक लगाएँ। पवित्री धारण: दोनों हाथों की अनामिका उँगली में कुश की पवित्री (पैंती) धारण करें। संकल्प: हाथ में त्रिकुशा, अक्षत (चावल), जौ और जल लेकर निम्नलिखित संकल्प पढ़ें:

संकल्प:
ॐ विष्णवे नमः ३।
हरिः ॐ तत्सद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे [अमुक] संवत्सरे [अमुक] मासे [अमुक] पक्षे [अमुक] तिथौ [अमुक] वासरे [अमुक] गोत्रोत्पन्नः [अमुक] शर्मा (वर्मा/गुप्तः) अहं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये।

(कोष्ठक वाले स्थानों पर अपना संवत्सर, मास, पक्ष, तिथि, वार, गोत्र और नाम बोलें)
संकल्प के बाद तीन कुश ग्रहण कर निम्न मंत्र तीन बार कहें:
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥

पात्र व जल की तैयारी एवं आवाहन
ताँबे या चाँदी के पात्र में श्वेत चन्दन, जौ, तिल, चावल, सुगन्धित पुष्प और तुलसीदल रखें। फिर उस पात्र में तर्पण के लिए शुद्ध जल भर दें। पात्र में रखे त्रिकुशा को तुलसी सहित सम्पुटाकार दायें हाथ में लेकर बायें हाथ से ढँक लें और देवताओं का आवाहन करें:

आवाहन मंत्र:
ॐ विश्वे देवास ऽआगत शृणुता म ऽइमꣳ हवम्। एदं बर्हिनिषीदत॥

अर्थ: ‘हे विश्वेदेवगण! आप यहाँ पदार्पण करें, हमारे इस प्रेमपूर्वक आवाहन को सुनें और इस कुश के आसन पर विराजें।’

देव तर्पण
दिशा व स्थिति: पूर्वाभिमुख रहें, सव्य भाव (जनेऊ बाएँ कंधे पर)।
तीर्थ: दायें हाथ की समस्त उँगलियों के अग्रभाग (देवतीर्थ) से एक-एक अञ्जलि अक्षत-मिश्रित जल अर्पित करें:
ॐ ब्रह्मा तृप्यताम्।
ॐ विष्णुस्तृप्यताम्।
ॐ रुद्रस्तृप्यताम्।
ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम्।
ॐ देवास्तृप्यन्ताम्।
ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम्।
ॐ वेदास्तृप्यन्ताम्।
ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम्।
ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम्।
ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम्।
ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम्।
ॐ संवत्सरः सावयवस्तृप्यताम्।
ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम्।
ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम्।
ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम्।
ॐ नागास्तृप्यन्ताम्।
ॐ सागरास्तृप्यन्ताम्।
ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम्।
ॐ सरितस्तृप्यन्ताम्।
ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम्।
ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम्।
ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम्।
ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्।
ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम्।
ॐ भूतानि तृप्यन्ताम्।
ॐ पशवस्तृप्यन्ताम्।
ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम्।
ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम्।
ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम्।

ऋषि तर्पण
देवतीर्थ (उँगलियों के अग्रभाग) से ही ऋषियों को एक-एक अञ्जलि जल दें:
ॐ मरीचिस्तृप्यताम्।
ॐ अत्रिस्तृप्यताम्।
ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम्।
ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्।
ॐ पुलहस्तृप्यताम्।
ॐ क्रतुस्तृप्यताम्।
ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्।
ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्।
ॐ भृगुस्तृप्यताम्।
ॐ नारदस्तृप्यताम्॥

दिव्य मनुष्य तर्पण
दिशा व स्थिति: उत्तर दिशा की ओर मुख करें। जनेऊ को माला की भाँति गले में धारण करें (निवीती भाव)। सीधा बैठें। तीर्थ: कनिष्ठिका के मूल भाग (प्राजापत्य तीर्थ) से जौ सहित जल दो-दो अञ्जलि दें:
ॐ सनकस्तृप्यताम् – २
ॐ सनन्दनस्तृप्यताम् – २
ॐ सनातनस्तृप्यताम् – २
ॐ कपिलस्तृप्यताम् – २
ॐ आसुरिस्तृप्यताम् – २
ॐ वोढुस्तृप्यताम् – २
ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम् – २

दिव्य पितृतर्पण
दिशा व स्थिति: दक्षिण दिशा की ओर मुख करें। बायाँ घुटना जमीन पर लगाएँ। जनेऊ दायें कंधे पर और बाएँ हाथ के नीचे रखें (अपसव्य भाव)।
कुश व तीर्थ: मोटक (कुश की जड़ और अग्रभाग दक्षिण की ओर) अँगूठे और तर्जनी के बीच रखें। पात्र के जल में काला तिल मिलाएँ और पितृतीर्थ (अँगूठे और तर्जनी के मध्य भाग) से तीन-तीन अञ्जलि जल दें:
ॐ कव्यवाडनलस्तृप्यताम्, इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः – ३
ॐ सोमस्तृप्यताम्, इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः – ३
ॐ यमस्तृप्यताम्, इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः – ३
ॐ अर्यमा तृप्यताम्, इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः – ३
ॐ अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यन्ताम्, इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्यः स्वधा नमः – ३
ॐ सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम्, इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्यः स्वधा नमः – ३
ॐ बर्हिषदः पितरस्तृप्यन्ताम्, इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्यः स्वधा नमः – ३

 यम तर्पण
अपसव्य रहकर पितृतीर्थ से चौदह यमों को तीन-तीन अञ्जलि तिल-सहित जल दें:
ॐ यमाय नमः – ३
ॐ धर्मराजाय नमः – ३
ॐ मृत्यवे नमः – ३
ॐ अन्तकाय नमः – ३
ॐ वैवस्वताय नमः – ३
ॐ कालाय नमः – ३
ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः – ३
ॐ औदुम्बराय नमः – ३
ॐ दध्नाय नमः – ३
ॐ नीलाय नमः – ३
ॐ परमेष्ठिने नमः – ३
ॐ वृकोदराय नमः – ३
ॐ चित्राय नमः – ३
ॐ चित्रगुप्ताय नमः – ३

मनुष्य पितृ तर्पण (स्वपितृ तर्पण)
जल के लोटे पर पहले सीधा (दायाँ) हाथ, उसके ऊपर उल्टा (बायाँ) हाथ रखकर पितरों का आवाहन करें:
ॐ आगच्छन्तु मे पितरः इमं गृह्णन्तु जलाञ्जलिम्।
अपने पितरों का नाम और गोत्र बोलते हुए पितृतीर्थ से तीन-तीन अञ्जलि जल अर्पित करें:
पिता: अस्मत्पिता [पिता का नाम] शर्मा वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः – ३
दादा: अस्मत्पितामहः [दादा का नाम] शर्मा रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः – ३
परदादा: अस्मत्प्रपितामहः [परदादा का नाम] शर्मा आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः – ३
माता: अस्मन्माता [माता का नाम] देवी वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः – ३
दादी: अस्मत्पितामही [दादी का नाम] देवी रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः – ३
परदादी: अस्मत्प्रपितामही [परदादी का नाम] देवी आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः – ३

(इसके पश्चात् ९ बार पितृतीर्थ से सामान्य जलाञ्जलि छोड़ें)

 विश्व-कल्याण एवं सर्वपितृ प्रार्थना
सव्य होकर पूर्वाभिमुख हों और निम्नलिखित श्लोक पढ़ते हुए जल अर्पित करें:

देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसाः।
पिशाचा गुह्यकाः सिद्धाः कूष्माण्डास्तरवः खगाः॥

जलेचरा भूमिचरा वाय्वाधाराश्च जन्तवः।
प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिलाः॥

नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिताः।
तेषामाप्यायनायैतद्दीयते सलिलं मया॥

येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङ्क्षिणः॥

ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥

अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम्।
आ ब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम्॥

येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा॥

वस्त्र-निष्पीड़न
वस्त्र को चार बार मोड़कर जल में डुबोएँ। बाहर लाकर अपसव्य होकर अपने बाएँ भाग में भूमि पर निचोड़ते हुए कहें:
“ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः।
ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्॥”
(नोट: यदि घर में किसी मृत पुरुष का वार्षिक श्राद्ध आदि अशौच कर्म हो तो वस्त्र-निष्पीड़न नहीं किया जाता।)

भीष्म तर्पण
दक्षिणाभिमुख होकर अपसव्य भाव से पितृतीर्थ द्वारा भीष्म पितामह को तिलोदक दें:
“वैयाघ्रपदगोत्राय साङ्कृतिप्रवराय च।
गङ्गापुत्राय भीष्माय प्रदास्येऽहं तिलोदकम्।
अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्मवर्मणे॥”

अर्घ्यदान एवं सूर्योपस्थान
आचमन व प्राणायाम करें। जनेऊ सव्य (बाएँ कंधे पर) करें।
शुद्ध जल में श्वेत चन्दन, अक्षत, पुष्प और तुलसीदल मिलाकर षड्दल कमल में ब्रह्मादि देवताओं की पूजा कर अर्घ्य दें:

ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन ऽआवः। स बुध्न्या ऽउपमा ऽअस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः॥ ॐ ब्रह्मणे नमः। ब्रह्माणं पूजयामि॥

ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्य पाꣳसुरे स्वाहा॥ ॐ विष्णवे नमः। विष्णुं पूजयामि॥

ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽउतो त ऽइषवे नमः। बाहुभ्यामुत ते नमः॥ ॐ रुद्राय नमः। रुद्रं पूजयामि॥

ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥ ॐ सवित्रे नमः। सवितारं पूजयामि॥

ॐ मित्रस्य चर्षणीधृतोऽवो देवस्य सानसि। द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम्॥ ॐ मित्राय नमः। मित्रं पूजयामि॥

ॐ इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय। त्वामवस्युराचके॥ ॐ वरुणाय नमः। वरुणं पूजयामि॥

सूर्यदेव को अर्घ्य दें:
एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥

सूर्योपस्थान (हाथ ऊपर उठाकर):
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षꣳ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च॥

 दिक्-नमस्कार एवं पुनः देवतर्पण
प्रदक्षिणा करते हुए दसों दिशाओं को नमस्कार करें:
ॐ प्राच्यै इन्द्राय नमः।
ॐ आग्नेय्यै अग्नये नमः।
ॐ दक्षिणायै यमाय नमः।
ॐ नैर्ऋत्यै निरृतये नमः।
ॐ प्रतीच्यै वरुणाय नमः।
ॐ वायव्यै वायवे नमः।
ॐ उदीच्यै कुबेराय नमः।
ॐ ऐशान्यै ईशानाय नमः।
ॐ ऊर्ध्वायै ब्रह्मणे नमः।
ॐ अवाच्यै अनन्ताय नमः।
बैठकर देवतीर्थ से पुनः जल दें:
ॐ ब्रह्मणे नमः।
ॐ अग्नये नमः।
ॐ पृथिव्यै नमः।
ॐ ओषधीभ्यो नमः।
ॐ वाचे नमः।
ॐ वाचस्पतये नमः।
ॐ महद्भ्यो नमः।
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ अद्भ्यो नमः।
ॐ अपां पतये नमः।
ॐ वरुणाय नमः।

तर्पण-समर्पण
तर्पण के जल को नेत्रों व मुख पर लगाएँ और तीन बार जपें:
ॐ अच्युताय नमः। ॐ अच्युताय नमः। ॐ अच्युताय नमः।
समस्त कर्म भगवान को समर्पित करें:
ॐ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु॥

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