सनातन स्तोत्र संग्रह
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सनातन देव

Shree Saraswati Pooja Paddhati । अथ सरस्वती पूजा

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रचयिता: पारंपरिक पाठ संख्या: 3
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सरस्वती पूजा सम्बन्धि कुछ 

मिट्टी की मूर्तियों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है, विशेषकर भारत में, जहां गणेश चतुर्थी और दुर्गा पूजा जैसे त्योहारों पर मिट्टी की मूर्तियों का निर्माण और विसर्जन होता है। हालांकि, इन मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा करते समय विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है। विशेष प्राण प्रतिष्ठा एक धार्मिक अनुष्ठान है जिसमें मूर्ति में देवी-देवता की ऊर्जा और प्राणों का निवास कराया जाता है। यह अनुष्ठान तभी किया जाता है जब मूर्ति का स्थायी रूप से मंदिर या किसी अन्य पवित्र स्थान पर पूजन करना हो। विशेष प्राण प्रतिष्ठा के बाद मूर्ति को एक साधारण वस्तु के रूप में नहीं देखा जा सकता और उसका प्रतिदिन पूजन, प्रसाद अर्पण, और भोग करना आवश्यक हो जाता है। इस कारण से, यदि कोई मिट्टी की मूर्ति की विशेष प्राण प्रतिष्ठा कराता है, तो उसे विसर्जित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह मूर्ति पूजा का स्थायी हिस्सा बन जाती है। मिट्टी की मूर्तियाँ अक्सर अस्थायी होती हैं और विसर्जन के लिए बनाई जाती हैं, ताकि वे प्राकृतिक रूप से मिट्टी में वापस मिल जाएँ और पर्यावरण को कोई हानि न पहुँचे। इसलिए, ऐसी मूर्तियों के लिए सामान्य प्रतिष्ठा की सलाह दी जाती है। सामान्य प्रतिष्ठा का मतलब है कि मूर्ति की पूजा की जाती है, लेकिन उसमें विशेष प्राण प्रतिष्ठा नहीं की जाती। पूजा के बाद, मूर्ति का विसर्जन करना उचित होता है, जिससे धार्मिक अनुष्ठान पूरा हो जाता है और मूर्ति अपने प्राकृतिक तत्वों में लौट जाती है। इसलिए, मिट्टी की मूर्तियों के लिए विशेष प्राण प्रतिष्ठा से बचना चाहिए और सामान्य प्रतिष्ठा के बाद उनका विसर्जन करना चाहिए। इससे न केवल धार्मिक नियमों का पालन होता है, बल्कि पर्यावरण संतुलन भी बना रहता है। धातु की मूर्तियों का प्रतिष्ठा धार्मिक अनुष्ठान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, विशेष रूप से स्थायी पूजन के लिए। धातु की मूर्तियाँ मंदिरों, घरों और धार्मिक स्थलों में स्थापित की जाती हैं और प्राण प्रतिष्ठा के माध्यम से इनमें देवी-देवताओं की ऊर्जा का आह्वान किया जाता है। प्राण प्रतिष्ठा क्या है? प्राण प्रतिष्ठा वह अनुष्ठान है जिसमें मूर्ति में देवी या देवता के प्राणों का निवास कराया जाता है, जिससे वह मूर्ति पूजनीय और जीवंत मानी जाती है। इस अनुष्ठान के बिना मूर्ति केवल एक धातु की वस्तु होती है, लेकिन प्राण प्रतिष्ठा के बाद वह आध्यात्मिक महत्व प्राप्त करती है। धातु की मूर्ति का महत्व: धातु की मूर्तियाँ, जैसे पीतल, कांस्य, या तांबे की मूर्तियाँ, लंबे समय तक टिकाऊ होती हैं और इन्हें स्थायी रूप से स्थापित करने के लिए उपयुक्त माना जाता है। मंदिरों और घरों में इन मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है ताकि दैनिक पूजा और आराधना की जा सके। इन मूर्तियों का विसर्जन नहीं किया जाता, बल्कि उनका नियमित रूप से पूजन, अभिषेक, और देखभाल की जाती है। धातु की मूर्ति की प्रतिष्ठा का अनुष्ठान: धातु की मूर्ति की प्रतिष्ठा का अनुष्ठान विधिपूर्वक किया जाता है। इसमें मंत्रोच्चारण, विशेष पूजा, हवन, और देवता का आवाहन शामिल होता है। इस प्रक्रिया में देवता को मूर्ति में निवास करने के लिए आमंत्रित किया जाता है और मूर्ति को मंदिर या घर में एक पवित्र स्थान पर स्थापित किया जाता है। एक बार प्रतिष्ठा हो जाने के बाद, मूर्ति की पूजा नियमित रूप से करनी होती है। यह मूर्ति अब एक पवित्र विग्रह के रूप में पूजनीय हो जाती है और इसकी देखभाल अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ की जाती है। धातु की मूर्तियों का प्रतिष्ठा इसलिए विशेष होता है क्योंकि इसे स्थायी रूप से पूजा के लिए रखा जाता है, और इसके बाद इसे विसर्जित नहीं किया जाता।

धातु के मुर्ति का प्राण प्रतिष्ठा विधि अलग से देखे अथ सरस्वती पूजा

अथ सरस्वती पूजा आरभ्यते शुद्ध होकर हात मे फुल ले के माता सरस्वती को प्रार्थना करना है। या कुन्देन्दुतुषारहार–धवला या शुभ्र–वस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । या ब्रह्माच्युत–शंकर–प्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।। १ ।।

ॐ सर्वेभ्यो गुरुभ्यो नमः । ॐ सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । ॐ सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः । प्रारंभ कार्यं निर्विघ्नमस्तु। शुभं शोभनमस्तु। इष्ट देवता कुलदेवता सुप्रसन्ना वरदा भवतु। अनुज्ञां देहि । शुद्धासन उपविश्य आचम्य (शुद्ध आसन मे वैठ कर आचमन करे) ॐ केशवाय नमः , ॐ नारायणाय नमः , ॐ माधवाया नमः  हाथ थोएं ॐ गोविन्दाय ।

प्राणायामः हात मे जल लेकर विनियोग बोले ॐ प्रणवस्य परब्रह्म ऋषिः । परमात्मा देवता । दैवी गायत्री छन्दः । प्राणायामे विनियोगः । ॐ भूः । ॐ भुवः । ॐ स्वः । ॐ महः । ॐ जनः । ॐ तपः । ॐ सत्यं । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । ।। प्राणायाम करके हाथ थोवे।। । अविघ्नमस्तु विघ्नहर्ताजिकी  प्रार्थना करे  सुमुखश्च एकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः । लंबोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः ।। धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो बालचन्द्रो गजाननः । द्वादशैतानि नामानि यः पठेत्श्रुणुयादपि ।। विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । संग्रामे संकटेश्चैव विघ्नः तस्य न जायते।। सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये र्त्यंबके देवी नारायणी नमोऽस्तुते।। विनायकं गुरुं भानुं ब्रह्माविष्णुमहेश्वरान्। सरस्वतीं प्रणम्यादौ सर्व कार्यार्थ सिद्धये।।

अथ ध्यानम् सरस्वती माया दृष्टा वीणापुस्तकधारिणी । हंसवाहनसंयुक्ता विद्यादानं करोतु मे ।। प्रथमं भारती नाम, द्वितीयं च सरस्वती । तृतीयं शारदा देवी, चतुर्थं हंसवाहिनी ।। पञ्चमं जगती ख्याता, षष्ठं वागीश्वरी तथा । सप्तमं कौमुदी प्रोक्ता, अष्टमं ब्रहचारिणी ।। नवमं बुद्धिदात्री च, दशमं वरदायिनी । एकादशं चन्द्रकान्तिः, द्वादशं भुवनेश्वरी ।। द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।  जिह्वाग्रे वसते नित्यं ब्रह्मरूपा सरस्वती ।। अक्षत फुल लेकर संकल्प करे– संकल्प हरिः ॐ तत्सत् अद्येह श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञाय प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणो.द्वितीय परार्धे विष्णुपदे श्री श्वेतवराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अमुक देशे अमुक क्षेत्रेशालिवाहनीयशाके के वर्तमाने अमुक नाम संवत्सरे उत्तरायणे, अमुक ऋतौ अमुक मासे, अमुक पक्षे अमुक तिथौ अमुक नक्षत्रे अमुक वासरे सर्व ग्रहेषु यथा राशि स्थान स्थितेषु सत्सु येवं गुणविशेषेण विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ मम आत्मन श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्यर्थं विशेषत विद्याध्याने सफलता प्राप्त्यर्थं अमुक गोत्रस्य परिवारान्वितस्य मम ज्ञाताज्ञातपापक्षयपूर्वक अस्मदादीनां सबालवनितानां विद्यान्रागिणां सर्वेषां बालकानां बालिकानां च श्रीवागीश्वरी सरस्वती–सुप्रसादसिद्धिद्वारा सर्वविधविद्या –प्राप्त्यर्थं ज्ञानविवृद्धयर्थं श्रीसरस्वती देवीप्रीत्यर्थं यथा शक्त्या यथा मिलितोपचार द्रव्यैः पुराणोक्त मन्त्रैः ध्यानावाहनादि षोडशोपचारैः सरस्वती देवीं उद्दिश्य, सरस्वती देवीं प्रीत्यर्थं इयं पूजनं एवं सरस्वती स्तोत्रं पठनं च करिष्ये (वयं करिष्यामहे ) । करन्यासः ॐ ह्रां । अंगुष्ठाभ्यायां नमः । हृदयाय नमः । ॐ ह्रीं । तर्जनीभ्यां नमः । शिरसे स्वाहा । ॐ ह्रुं । मध्यमाभ्यां नमः । शिखायै वौषट्। ॐ ह्रैं । अनामिकाभ्यां नमः । कवचाय हुम्। ॐ ह्रौं । कनिष्ठिकाभ्यां नमः । नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ ह्रः । करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । अस्त्राय फट्। । विघ्नहर्ता गणपति प्रार्थना । ॐ वक्रतुण्ड महाकाय कोटि सूर्य समप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा । ॐ भूर्भुवस्वः महागणपतये नमः । प्रार्थनां समर्पयामि । अनया पूजा विघ्नहर्ता महागणपति प्रीयताम्। अथ सरस्वती पूजा आह्वान : सर्वलोकस्य जननीं सर्वविद्यां प्रदायिनीम् । ॐ महासरस्वत्यै नमः, महासरस्वतीमावाहयामि, आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि । ( आह्वान के लिए पुष्प अर्पित करें ।) आसन : तप्तकांचनवर्णाभं मुक्तामणिविराजितम् । अमलं कमलं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः , आसनं समर्पयामि । (पुष्प अर्पित करें ।) पाद्य : गंगादितीर्थसम्भूतं गन्धपुष्पादिभिर्युतम् । ट पाद्यं ददाम्यहं देवि गृहाणाशु नमोऽस्तु ते ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः , पादयोः पाद्यं समर्पयामि । (पाद्य अर्पित करें ।) अर्घ्य : अष्टगन्धसमायुक्तं स्वर्णपात्रप्रपूरितम् । अर्घ्यं गृहाणमद्यतं महादेवि नमोऽस्तु ते ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि । (चन्दन मिश्रित जल अघ्यपात्र से देवी के हाथों में दें ।) आचमन : सर्वलोकस्य या विद्या ब्रह्मविष्ण्वादिभिः स्तुता । ॐ महासरस्वत्यै नमः, आचमनीयं जलं समर्पयामि । (जल चढÞाएँ ।) स्नान : मन्दाकिन्याः समानीतैर्हेमाम्भोरुहवासितैः । स्नानं कुरुष्व देवेशि सलिलैश्च सुगन्धिभिः ।। (स्नानीय जल अर्पित करें ।) स्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । ठ (ॐ महासरस्वत्यै नमः’ बोलकर आचमन हेतु जल दें ।) दुग्ध स्नान : कामधेनुसमुत्पन्नां सर्वेषां जीवनं परम् । पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम् ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, पयः स्नानं समर्पयामि । पयः स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । (कच्चे दूध से स्नान कराएँ, पुनः शुद्ध जल से स्नान कराएँ ।) दधिस्नान : पयसस्तु समुद्भूतं मधुराम्लं शशिप्रभम् । दध्यानीतं मया देवि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः सुरभि नो मुखा करत्प्र ण आयू गुँ षि तारिषत् । ॐ महासरस्वत्यै नमः, दधिस्नानं समर्पयामि । दधिस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । (दधि से स्नान कराएँ, फिर शुद्ध जल से स्नान कराएँ ।) घृतस्नान : नवनीतसमुत्पन्नं सर्वसंतोषकारकम् । ड घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ घृतं घृतपावनः पिबत वसां वसापावनः पिबतान्तरिक्षस्य हविरसि स्वाहा । दिशः प्रदिश आदिशो विदिश उद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः , घृतस्नानं समर्पयामि । घृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । (घृत स्नान कराकर शुद्ध जल से स्नान कराएँ ।) मधुस्नान : तरुपुष्पसमुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु । तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ।। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव(गुँ) रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता ।। मधुमान्ना वनस्पतिर्मधुमाँ(गुँ) अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवंतु नः ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः , मधुस्नानं समर्पयामि । मधुस्नानन्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । ढ (शहद स्नान कराकर शुद्ध जल से स्नान कराएँ ।) शर्करास्नान : इक्षुसारसमुद्भूता शर्करा पुष्टिकारिका । मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ अपा गुं रसमुद्वयस गुं सूर्ये सन्त गुं समाहित्म । अपा गुं रसस्य यो रसस्तं वो गृह्याम्युत्तममुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गुह्ढाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम् ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः शर्करास्नानं समर्पयामि, शर्करा स्नानान्ते पुनः शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि । (शर्करा स्नान कराकर जल से स्नान कराएँ ।) पञ्चामृत स्नान : (दूध, दही, घी, शकर एवं शहद मिलाकर पंचामृत बनाएँ व निम्न मंत्र से स्नान कराएँ ।) पयो दधि घृतं चैव मधुशर्करयान्वितम् । पंचामृतं मयानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ पंच नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्त्रोतसः । सरवस्ती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्(सरित् ।। ज्ञण् ॐ महासरस्वत्यै नमः , पंचामृतस्नानं समर्पयामि, पंचामृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । (पंचामृत स्नान व जल से स्नान कराएँ ।) गन्धोदक स्नान : मलयाचलसम्भूतं चन्दनागरुसम्भवम् । चन्दनं देवदेवेशि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, गन्धोदकस्नानं समर्फयामि । (चंदनयुक्त जल से स्नान कराएँ ।) (नोट :( जो व्यक्ति श्री सूत्त, पुरुष सूक्त अथवा सहस्रनाम आदि से पुष्पार्चन अथवा जल अभिषेक करना चाहते हैं, वे अर्चन अथवा अभिषेक करें फिर शुद्धोदक स्नान कराएँ अथवा सीधे शुद्धोदक स्नान कराएँ ।) शुद्धोदक स्नान : मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम् । तदिदं कल्पितं तुभ्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । (गंगाजल अथवा शुद्ध जल से स्नान कराएँ ।) ज्ञज्ञ आचमन : पश्चात ’ॐ महासरस्वत्यै नमः’ से आचमन कराएँ । वस्त्र : दिव्याम्बरं नूतनं हि क्षौमं त्वतिमनोहरम् । दीयमानं मया देवि गृहाण जगदम्बिके ।। ॐ उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह । प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, वस्त्रं समर्पयामि, आचमनीयं जलं च समर्पयामि । (वस्त्र अर्पित करें, आचमनीय जल दें ।) उपवस्त्र : कंचुकीमुपवस्त्रं च नानारत्नैः समन्वितम् । गृहाण त्वं मया दत्तं मंगले जगदीर्श्वरि ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, उपवस्त्रं समर्पयामि, आचमनीयं जलं च समर्पयामि । (उपवस्त्र चढÞाएँ, आचमन के लिए जल दें ।) यज्ञोपवीत : ज्ञद्द ॐ तस्मादअकूवा अजायंत ये के चोभयादतः । गावोह यज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ।। ॐ यज्ञोपवीतं परमं वस्त्रं प्रजापतयेः त्सहजं पुरस्तात ।। आयुष्यम अग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तुतेजः । ॐ महासरस्वत्यै नमः । यज्ञोपवीतं समर्पयामि । आभूषण : रत्नकंकणवैदूर्यमुक्ताहारादिकानि च । सुप्रसन्नेन मनसा दत्तानि स्वीकुरुष्व भोः ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः , नानाविधानि कुंडलकटकादीनि आभूषणानि समर्पयामि । (आभूषण समर्पित करें ।) गन्ध : श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् । विलेपनं सुरश्रेष्ठे चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, गन्धं समर्पयामि । (केसर मिश्रित चन्दन अर्फित करें ।) रक्त चन्दन : रत्तचन्दनसम्मिश्रं पारिजातसमुद्भवम् । ज्ञघ मया दत्तं महादेवि चन्दनं प्रतिगृह्यताम ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, रक्तचन्दनं समर्फयामि । (रक्त चंदन चढÞाएँ ।) सिन्दूर : सिन्दूरं रत्तवर्णं च सिन्दूरतिलकप्रिये । भक्तया दत्तं मया देवि सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वात प्रमियः पतयन्ति यह्वाः । घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, सिन्दूरं समर्पयामि । (सिन्दूर चढÞाएँ ।) कुंकुम : कुंकुमं कामदं दिव्यं कुंकुमं कामरूपिणम् । अखण्डकामसौभाग्यं कुंकुमं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, कुंकुमं समर्पयामि । (कुंकुम अर्पित करें ।) पुष्पसार (इत्र) : तैलानि च सुगन्धीनि द्रव्याणि विविधानि च । मया दत्तानि लेपार्थं गृहाण परमेश्वरि ।। ज्ञद्ध ॐ महासरस्वत्यै नमः, पुष्पसारं च समर्पयामि । (इक्र चढÞाएँ ।) अक्षत : अक्षताश्च सुरश्रेष्ठे कुंकुमात्ताः सुशोभिताः । मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरि ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, अक्षतान्समर्पयामि । (कुंकुमाक्त अक्षत चढÞाएँ ।) पुष्पमाला : माल्यादीनि सुगन्धीनि माल्यादीनि वै प्रभो । मयानीतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, पुष्पं पुष्पमालां च समर्पयामि । (लाल कमल के पुष्प तथा पुष्पमालाओं से अलंकृत करें ।) दूर्वा : विष्ण्वादिसर्वदेवानां प्रियां सर्वसुशोभनाम् । क्षीरसागरसम्भूते दूर्वां स्वीकुरू सर्वदा ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, दूर्वांकुरान्समर्पयामि । (दूर्वांकुर अर्पित करें ।) ज्ञछ सर्वाङ्ग पूजनम् : समस्त अंग पूजन ॐ महासरस्वत्यै नमः, सर्वांग पूजयामि धूप : वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यः सुमनोहरः । आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः , धूपमाघ्रापयामि । (धूप आघ्रापित करें ।) दीप : कार्फास वर्तिसंयुक्तं घृतयुत्तं मनोहरम् । तमो नाशकरं दीपं गृहाण परमेश्वरि ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, दीपं दर्शयामि । (दीपक दिखाकर हाथ धो लें ।) नैवेद्य : (मालपुए सहित पंचमिष्ठान्न व सूखे मेवे।) नैवेद्यं गृह्यतां देवि भक्ष्यभोज्य समन्वितम् । ज्ञट षड्रसैन्वितं दिव्यं लक्ष्मी देवि नमोऽस्तु ते ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, नैवेद्यं निवेदयामि । बीच में जल छोडÞते हुए निम्न मंत्र बोलें : १. ॐ प्राणाय स्वाहा २. ॐ अपानाय स्वाहा . ३ ॐ समानाय स्वाहा ४. ॐ उदानाय स्वाहा ५. ॐ व्यानाय स्वाहा । मध्ये पानीयम्, उत्तरापोशनार्थं हस्तप्रक्षालनार्थं मुखप्रक्षालनार्थं च जलं समर्पयामि । ( नैवेद्य निवेदित कर पुनः हस्तप्रक्षालन के लिए जल अर्पित करें ।) करोद्वर्तन : ॐ महासरस्वत्यै नमः ’ यह कहकर करोद्वर्तन के लिए हाथों में चन्दन उपलेपित करें । आचमन : शीतलं निर्मलं तोयं कर्पूरण सुवासितम् । आचम्यतां जलं ह्येतत्प्रसीद परमेश्वरि ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, आचमनीयं जलं समर्पयामि । (आचमन के लिए जल दें ।) ऋतुफल : (सीताफल, गन्ना, सिंघाडÞे व अन्य फल ।) ज्ञठ फलेन फलितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । तस्मात्फलप्रदादेन पूर्णाः सन्तु मनोरथाः ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, अखण्डऋतुफलं समर्पयामि, आचमनीयं जलं च समर्पयामि । (ऋतुफल अर्पित करें तथा आचमन के लिए जल दें ।) ताम्बूल : पूगीफलं महादिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम् । एलादिचूर्णसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, मुखवासार्थे ताम्बूलं समर्पयामि । (लवंग, इलायची एवं ताम्बूल अर्पित करें ।) दक्षिणा : हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः । अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः, दक्षिणां समर्पयामि । (दक्षिणा चढÞाएँ ।) लेखनी पुस्तक पूजन : लेखनी (कलम) पर नाडÞा बाँधकर सामने की ओर रखें । ज्ञड निम्न मंत्र बोलकर पूजन करें : लेखनी निर्मिता पूर्वं ब्रह्मणा परमेष्ठिना । लोकानां च हितार्थाय तस्मात्तां पूजयाम्यहम् ।। ॐ लेखनीस्थायै देव्यै नमः गंध, पुष्प, पूजन कर इस प्रकार प्रार्थना करें : शास्त्राणां व्यवहाराणां विद्यानामाप्नुयाद्यतः । अतस्त्वां पूजयिष्यामि मम हस्ते स्थिरा भव ।। या कुन्देन्दुतुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता । या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्यासना ।। या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवेः सदा वन्दिता । सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।। ध्यान बोलकर प्रणाम करें । ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्री सरस्वत्यै नमः’ आरती : निम्न लिखित मन्त्र पढÞते हुए अब आरति सजाए : चक्षुर्दं सर्वलोकानां तिमिरस्य निवारणम् । आर्तिक्यं कल्पितं भक्तया गृहाण परमेश्वरि ।। या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता ज्ञढ या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।। १ ।। सरस्वती माता कि आरति जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता । सद्गुण, वैभवशालिनि, त्रिभुवन विख्याता ।।जय. ।। चन्द्रवदनि, पद्मासिनि द्युति मंगलकारी । सोहे हंस सवारी, अतुल तेजधारी ।। जय. ।। बायें कर में वीणा, दूजे कर माला । शीश मुकुट मणि सोहे, गले मोतियन माला ।।जय. ।।् देव शरण में आये, उनका उद्धार किया । पैठि मंथरा दासी, असुर संहार किया ।।जय. ।। वेदज्ञानप्रदायिनी, बुद्धिप्रकाश करो ।। मोहज्ञान तिमिर का सत्वर नाश करो ।।जय. ।। धूपदीपफलमेवापूजा स्वीकार करो। ज्ञानचक्षु दे माता, सब गुणज्ञान भरो ।।जय. ।। माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे। हितकारी, सुखकारी ज्ञान भक्ति पावे ।।जय. ।। द्दण् ॐ महासरस्वत्यै नमः , नीराजनं समर्पयामि । (जल छोडÞें व हाथ धोएँ ।) प्रदक्षिणा : यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च । तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणपदे पदे ।। (प्रदक्षिणा करें ।) मंत्र –पुष्पांजलि : ( अपने हाथों में पुष्प लेकर निम्न मंत्रों को बोलें) : – ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । तेह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ।। ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे । स मे कामान्कामकामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु ।। कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः । ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्यं राज्यं महाराज्यमपित्यमयं समन्तपर्यायी स्यात्सार्वभौमः सार्वायुषान्तादापरार्धात् । पृथिव्यै समुद्रपर्यन्ताया एकराडिति द्दज्ञ तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन्गृहे । आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति । ॐ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः ।। या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।। १ ।। ॐ महासरस्वत्यै नमः , मंत्रपुष्पांजलिं समर्पयामि प्रार्थना : (श्रीसरस्वतीस्तुती ) या कुन्देन्दु–तुषारहार–धवला या शुभ्र–वस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । या ब्रह्माच्युत–शंकर–प्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।। १ ।। दोर्भिर्युक्ता चतुर्भिः स्फटिकमणिमयीमक्षमालां दधाना हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण । भासा कुन्देन्दु–शंखस्फटिकमणिनिभा भासमानाऽसमाना सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना ।। २ ।। द्दद्द आशासु राशी भवदंगवल्लि भासैव दासीकृत –दुग्धसिन्धुम् । मन्दस्मितैर्निन्दित –शारदेन्दुं वन्देऽरविन्दासन –सुन्दरि त्वाम् ।। ३ ।। शारदा शारदाम्बोजवदना वदनाम्बुजे । सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात् ।। ४ ।। सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृ–देवताम् । देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जनाः ।। ५ ।। पातु नो निकषग्रावा मतिहेम्नः सरस्वती । प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या ।। ६ ।। शुद्धां ब्रह्मविचारसारपरमा –माद्यां जगद्व्यापिनीं वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् । हस्ते स्पाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ।। ७ ।। वीणाधरे विपुलमंगलदानशीले भक्तार्तिनाशिनि विरिंचिहरीशवन्द्ये । कीर्तिप्रदेऽखिलमनोरथदे महार्हे विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ।। ८ ।। द्दघ श्वेताब्जपूर्ण –विमलासन –संस्थिते हे श्वेताम्बरावृतमनोहरमंजुगात्रे । उद्यन्मनोज्ञ –सितपंकजमंजुलास्ये विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ।। ९ ।। मातस्त्वदीय –पदपंकज –झक्तियुत्ता ये त्वां भजन्ति निखिलानपरान्विहाय । ते निर्जरत्वमिह यान्ति कलेवरेण भूवह्नि –वायु–गगनाम्बु–विनिर्मितेन ।। १० ।। मोहान्धकार –भरिते हृदये मदीये मातः सदैव कुरु वासमुदारभावे । स्वीयाखिलावयव –निर्मलसुप्रभाभिः शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम् ।। ११ ।। ब्रह्मा जगत्सृजति पालयतीन्दिरेशः शम्भुर्विनाशयति देवि तव प्रभावैः । न स्यात्कृपा यदि तव प्रकटप्रभावे न स्युः कथंचिदपि ते निजकार्यदक्षाः ।। १२ ।। लक्ष्मिर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तृष्टिः प्रभा धृतिः । एताभिः पाहि तनुभिरष्टभिर्मां सरस्वती ।। १३ ।। सरसवत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नमः द्दद्ध वेद –वेदान्त –वेदांग – विद्यास्थानेभ्य एव च ।। १४ ।। सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने । विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोस्तु ते ।। १५ ।। यदक्षर –पदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् । तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ।। १६ ।। नए छात्रो के लिए ये श्लोक उच्चारण करके विद्यारम्भ करे सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि । विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ।। समर्पण : । कृतेनानेन पूजनेन भगवती महासरस्वती प्रीयताम्, न मम’ । (हाथ में जल लेकर छोडÞ दें ।) (हाथ में लिए फूल महासरस्वती पर चढÞा दें ।) प्रदक्षिणा करें, साष्टांग प्रणाम करें, अब हाथ जोडÞकर निम्न क्षमा प्रार्थना बोलें : – क्षमा प्रार्थना : आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि ।। मन्क्रहीनं त्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि । यत्पूजितं मया देवि परिपूर्ण तदस्तु मे ।। द्दछ त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वम्मम देवदेव । पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः । त्राहि माम्परमेशानि सर्वपापहरा भव ।। अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया । दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि ।। पूजन समर्पण : हाथ में जल लेकर निम्न मंक्र बोलें : – यस्य स्मृत्या च नाम्नोत्त्या तपः पूजा क्रियादिशु। न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तं अच्युतम्। कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्। करोमि यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि । ’ॐ अनेन यथाशक्ति अर्चनेन श्री महासरस्वती प्रसीदतुः ।।’ (जल छोडÞ दें, प्रणाम करें) विसर्जन : अब हाथ में अक्षत लें (गणेश एवं की प्रतिमा को छोडÞकर अन्य सभी) प्रतिष्ठित देवताओं को अक्षत छोडÞते हुए निम्न मंत्र से विसर्जन कर्म करें :– द्दट यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम् । इष्टकामसमृद्धयर्थं पुनर्अपि पुनरागमनाय च ।। प्रसाद ग्रहणं सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये र्त्यम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते। ॐ सरस्वत्यै नमः । सरस्वती देवी प्रसादं शिरसा गृह्णामि । तीर्थ ग्रहणं अकाल मृत्यु हरणं सर्व व्याधी विनाशनम्। सर्व दुरितोप शमनं देवी पादोदकं शुभं । ॐ सरस्वत्यै नमः । सरस्वती देवी तीर्थं शिरसा गृह्णामि । ध्यानम् ॐ श्री सरस्वती शुक्लवर्णां सस्मितां सुमनोहराम् ।। कोटिचंद्रप्रभामुष्टपुष्टश्रीयुक्तविग्रहाम्। वह्निशुद्धां शुकाधानां वीणापुस्तकमधारिणीम् ।। रत्नसारेन्द्रनिर्माणनवभूषणभूषिताम्। सुपूजितां सुरगणैः ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः ।। वन्दे भक्त्या वन्दिता च मुनीन्द्रमनुमानवैः । द्दठ ।। इति श्रीसरस्वती पूजनं सम्पूर्णं ।। विद्यारम्भ : नए छात्रो के लिए ये निम्न लिखित श्लोक उच्चारण करके विद्यारम्भ करे सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि । विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ।। नमो भगवति ! हे सरस्वति ! वन्दे तव पदयुगलम् ।। विद्यां बुद्धिं वितनु भारति चित्तं कारय मम विमलम् ।। वीणावादिनि शुभमतिदायिनि पुस्तकहस्ते देवनुते । वर्णज्ञानं सकलनिदानं सन्निहितं कुरु मम चित्ते ।। नमो ।। हंसवाहिनि ब्रह्मवादिनि करुणापूर्णा भव वरदे । मञ्जुलहासिनि नाट्यविलासिनि लास्यं कुरु मम रसनाग्रे ।। नमो ।। द्दड श्रीसरस्वत्यष्टोत्तरशतनामावलिः ॐ सरस्वत्यै नमः । ॐ महाभद्रायै नमः । ॐ महामायायै नमः । ॐ वरप्रदायै नमः । ॐ श्रीप्रदायै नमः । ॐ पद्मनिलयायै नमः । ॐ पद्माक्ष्यै नमः । ॐ पद्मवक्त्रायै नमः । ॐ शिवानुजायै नमः । ॐ पुस्तकभृते नमः । १० ॐ ज्ञानमुद्रायै नमः । ॐ रमायै नमः । ॐ परायै नमः । ॐ कामरूपायै नमः । ॐ महाविद्यायै नमः । ॐ महापातक नाशिन्यै नमः । ॐ महाश्रयायै नमः । ॐ मालिन्यै नमः । द्दढ ॐ महाभोगायै नमः । ॐ महाभुजायै नमः । २० ॐ महाभागायै नमः । ॐ महोत्साहायै नमः । ॐ दिव्याङ्गायै नमः । ॐ सुरवन्दितायै नमः । ॐ महाकाल्यै नमः । ॐ महापाशायै नमः । ॐ महाकारायै नमः । ॐ महाङ्कुशायै नमः । ॐ पीतायै नमः । ॐ विमलायै नमः । ३० ॐ विश्वायै नमः । ॐ विद्युन्मालायै नमः । ॐ वैष्णव्यै नमः । ॐ चन्द्रिकायै नमः । ॐ चन्द्रवदनायै नमः । ॐ चन्द्रलेखाविभूषितायै नमः । ॐ साविर्त्यै नमः । ॐ सुरसायै नमः । ॐ देव्यै नमः । ॐ दिव्यालङ्कारभूषितायै नमः । ४० घण् ॐ वाग्देव्यै नमः । ॐ वसुधायै नमः । ॐ तीव्रायै नमः । ॐ महाभद्रायै नमः । ॐ महाबलायै नमः । ॐ भोगदायै नमः । ॐ भारत्यै नमः । ॐ भामायै नमः । ॐ गोविन्दायै नमः । ॐ गोमत्यै नमः । ५० ॐ शिवायै नमः । ॐ जटिलायै नमः । ॐ विन्ध्यावासायै नमः । ॐ विन्ध्याचलविराजितायै नमः । ॐ चण्डिकायै नमः । ॐ वैष्णव्यै नमः । ॐ ब्राह्मयै नमः । ॐ ब्रह्मज्ञानैकसाधनायै नमः । ॐ सौदामिन्यै नमः । ॐ सुधामूर्त्यै नमः । ६० ॐ सुभद्रायै नमः । ॐ सुरपूजितायै नमः । घज्ञ ॐ सुवासिन्यै नमः । ॐ सुनासायै नमः । ॐ विनिद्रायै नमः । ॐ पद्मलोचनायै नमः । ॐ विद्यारूपायै नमः । ॐ विशालाक्ष्यै नमः । ॐ ब्रह्मजायायै नमः । ॐ महाफलायै नमः । ७० ॐ त्रयीमूर्त्यै नमः । ॐ त्रिकालज्ञायै नमः । ॐ त्रिगुणायै नमः । ॐ शास्त्ररूपिण्यै नमः । ॐ शुम्भासुरप्रमथिन्यै नमः । ॐ शुभदायै नमः । ॐ स्वरात्मिकायै नमः । ॐ रक्तबीजनिहर्न्त्यै नमः । ॐ चामुण्डायै नमः । ॐ अम्बिकायै नमः । ८० ॐ मुण्डकायप्रहरणायै नमः । ॐ धूम्रलोचनमर्दनायै नमः । ॐ सर्वदेवस्तुतायै नमः । ॐ सौम्यायै नमः । घद्द ॐ सुरासुर नमस्कृतायै नमः । ॐ कालरार्त्यै नमः । ॐ कलाधारायै नमः । ॐ रूपसौभाग्यदायिन्यै नमः । ॐ वाग्देव्यै नमः । ॐ वरारोहायै नमः । ९० ॐ वाराह्यै नमः । ॐ वारिजासनायै नमः । ॐ चित्राम्बरायै नमः । ॐ चित्रगन्धायै नमः । ॐ चित्रमाल्यविभूषितायै नमः । ॐ कान्तायै नमः । ॐ कामप्रदायै नमः । ॐ वन्द्यायै नमः । ॐ विद्याधरसुपूजितायै नमः । ॐ श्वेताननायै नमः । १०० ॐ नीलभुजायै नमः । ॐ चतुर्वर्गफलप्रदायै नमः । ॐ चतुरानन साम्राज्यायै नमः । ॐ रक्तमध्यायै नमः । ॐ निरञ्जनायै नमः । ॐ हंसासनायै नमः । घघ ॐ नीलजङ्घायै नमः । ॐ ब्रह्मविष्णुशिवान्मिकायै नमः । १०८ ।। इति श्रीसरस्वत्यष्टोत्तरशतनामावि

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