सनातन स्तोत्र एवं ग्रन्थ संग्रह
श्रीविष्णु
भगवान विष्णु

अनंत चतुर्दशी व्रत: महत्त्व, पूजा विधि एवं कथा

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रचयिता: पारंपरिक पाठ संख्या: 8
लिपि छनोट (Select Script): देवनागरी (संस्कृत) English (Roman) தமிழ் తెలుగు ಕನ್ನಡ ગુજરાતી বাংলা
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अनंत चतुर्दशी व्रत: महत्त्व, पूजा विधि एवं कथा
व्रत का महत्त्व एवं परिचय
अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान श्री हरि (विष्णु) के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है। यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। इस व्रत में सूत या रेशम के धागे को हल्दी अथवा कुमकुम से रंगकर, उसमें चौदह गांठें लगाई जाती हैं (ये 14 गांठें भगवान श्री हरि द्वारा रचित 14 लोकों की प्रतीक मानी गई हैं)। इस प्रकार राखी की तरह का 'अनंत' (अनंत सूत्र/डोरा) तैयार किया जाता है। पूजन के उपरांत इस अनंत रूपी धागे को व्रती अपनी भुजा पर बांधते हैं।
पुरुष इसे दाहिने हाथ में तथा स्त्रियाँ इसे बाएं हाथ में बांधती हैं।
ऐसी मान्यता है कि यह अनंत सूत्र साधक की सभी संकटों से रक्षा करता है।
यह अनंत डोरा भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय, उन्हें प्रसन्न करने वाला तथा अनंत फल देने वाला माना गया है।
यह व्रत धन, ऐश्वर्य, पुत्र-पौत्रादि एवं खोए हुए सौभाग्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है।
इस दिन नए अनंत डोरे को धारण करके पुराने डोरे का विसर्जन अथवा दान किया जाता है।
अग्नि पुराण के अनुसार व्रती को एक सेर आटे का मालपुआ अथवा पूड़ी बनाकर पूजा करनी चाहिए। उसमें से आधा भाग ब्राह्मण को दान दें और शेष भाग प्रसाद के रूप में बंधु-बांधवों के साथ ग्रहण करें। इस व्रत में नमक का सेवन वर्जित माना गया है।
यदि किसी व्यक्ति को अनंत सूत्र मार्ग में पड़ा हुआ मिल जाए, तो उसे भगवान की कृपा व आज्ञा समझकर अनंत व्रत तथा पूजन अवश्य करना चाहिए।
इस व्रत के प्रभाव से ही पांडवों ने जुए में खोया हुआ अपना संपूर्ण राज्य व सम्मान पुनः प्राप्त किया और महाभारत का युद्ध जीता था।
【 पूजन सामग्री 】
इस पूजा में यमुना (नदी), शेष (नाग) तथा अनंत (श्रीहरि) की मुख्य पूजा की जाती है। कलश को यमुना, दूर्वा को शेषनाग तथा 14 गांठों वाले सूत्र को श्रीहरि का प्रतीक माना जाता है। इसमें पुष्प, पत्र, नैवेद्य आदि सामग्री 14 की संख्या में उपयोग करना शुभ माना गया है। यदि यह व्रत 14 वर्षों तक विधिपूर्वक किया जाए, तो व्रती विष्णुलोक को प्राप्त करता है।
14 प्रकार के वृक्षों के पत्ते
मिट्टी का कलश - 1
मिट्टी का पूर्णपात्र (ढक्कन) - 1
दूर्वा (कुश/दूब)
चावल (अक्षत) - 250 ग्राम
कपूर - 1 पैकेट
धूप/अगरबत्ती - 1 पैकेट
पुष्प माला - 4
ऋतुफल - सामर्थ्यानुसार
पुष्प (यथासंभव 14 प्रकार के)
अंगवस्त्र - 1
नैवेद्य (मालपुआ, पूड़ी)
मिष्ठान्न - इच्छानुसार
नया अनंत सूत्र (14 गांठों वाला)
पुराना अनंत सूत्र (विसर्जन हेतु)
यज्ञोपवीत (जनेऊ) - 1 जोड़ा
वस्त्र / कलावा (मौली)
तुलसी दल
पान के पत्ते - 5
सुपारी - 5
लौंग एवं इलायची
पंचामृत (दूध, दही, घृत, शहद, शर्करा)
शेषनाग पर शयन करते हुए श्रीहरि की प्रतिमा/चित्र
ऊनी आसन (कंबल आदि)
【 पूजा विधि प्रारम्भ 】
पुराणों में यह व्रत नदी या सरोवर तट पर करना श्रेष्ठ माना गया है। घर पर पूजा स्थान को गंगाजल छिड़क कर शुद्ध व पवित्र कर लें। साधक प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर पत्नी सहित पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख आसन पर बैठें।
1. पवित्रीकरण:
दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न मंत्र बोलते हुए स्वयं पर तथा सभी पूजन सामग्री पर छिड़कें:
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

2. आचमन:
दाहिने हाथ की हथेली में जल लेकर निम्न मंत्रों से तीन बार आचमन करें:
ॐ केशवाय नमः (जल पिएं)
ॐ नारायणाय नमः (जल पिएं)
ॐ माधवाय नमः (जल पिएं)
तत्पश्चात "ॐ हृषीकेशाय नमः" बोलकर हाथ धो लें।
3. पवित्री धारण:
अनामिका अंगुली में कुश की पवित्री धारण करें:
ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः।
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्॥

4. स्वस्तिवाचन / देवता स्मरण:
हाथ में अक्षत-पुष्प लेकर निम्न देवताओं को प्रणाम करते हुए छोड़ते जाएं:
ॐ गणेशाम्बिकाभ्यां नमः।
ॐ केशवाय नमः।
ॐ नारायणाय नमः।
ॐ माधवाय नमः।
ॐ गोविन्दाय नमः।
ॐ विष्णवे नमः।
ॐ मधुसूदनाय नमः।
ॐ त्रिविक्रमाय नमः।
ॐ वामनाय नमः।
ॐ श्रीधराय नमः।
ॐ हृषीकेशाय नमः।
ॐ पद्मनाभाय नमः।
ॐ दामोदराय नमः।
ॐ संकर्षणाय नमः।
ॐ वासुदेवाय नमः।
ॐ प्रद्युम्नाय नमः।
ॐ अनिरुद्धाय नमः।
ॐ पुरुषोत्तमाय नमः।
ॐ अधोक्षजाय नमः।
ॐ नृसिंहाय नमः।
ॐ अच्युताय नमः।
ॐ जनार्दनाय नमः।
ॐ उपेन्द्राय नमः।
ॐ हरये नमः।
ॐ श्रीकृष्णाय नमः।
ॐ श्रीलक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः।
ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः।
ॐ शचीपुरन्दराभ्यां नमः।
ॐ मातृपितृभ्यां नमः।
ॐ इष्टदेवताभ्यो नमः।
ॐ ग्रामदेवताभ्यो नमः।
ॐ स्थानदेवताभ्यो नमः।
ॐ वास्तुदेवताभ्यो नमः।
ॐ सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः।
ॐ सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः।
5. संकल्प:
हाथ में अक्षत, पुष्प, पान का पत्ता, सुपारी, जल और द्रव्य (सिक्का) लेकर संकल्प करें:
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे (अपने नगर/क्षेत्र का नाम लें) बौद्धावतारे (संवत्सर का नाम) नाम संवत्सरे, श्रीसूर्ये (उत्तरायणे/दक्षिणायने), (ऋतु का नाम) ऋतौ, महामांगल्यप्रदे मासोत्तमे भाद्रपद मासे शुक्ल पक्षे चतुर्दश्यां तिथौ (वार का नाम) वासरे (नक्षत्र का नाम) नक्षत्रे (गोत्र का नाम) गोत्रोत्पन्नः (अपना नाम) अहम् ममसकुटुम्बस्य क्षेमस्थैर्यविजयायुराcount्यादिविध पुरुषार्थसिद्धयर्थं मया आचरितस्य वा आचर्यमाणस्य अनंतव्रतस्य सम्पूर्णफलप्राप्त्यर्थं श्रीमदनन्तपूजनं तत् अङ्गत्वेन गणेश-गौरी-कलश-यमुनादि-पूजनं च करिष्ये।
6. गौरी-गणेश एवं कलश स्थापना व पूजन:
सर्वप्रथम गौरी-गणेश का ध्यान कर अक्षत, रोली, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य अर्पित करें।
भूमि पर अष्टदल कमल बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। कलश में शुद्ध जल व गंगाजल भरें, उसमें सुपारी, सिक्का, दूर्वा डालें। कलश का पूजन करें।
शंख पूजन करें।
कलश में यमुना जी का ध्यान व आवाहन करें।
कलश पर रखे पूर्णपात्र में सप्तफणयुक्त दूर्वा से निर्मित शेषजी तथा भगवान अनंत (शयन मुद्रा में श्रीहरि) की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें। साथ ही 14 गांठों वाला अनंत सूत्र भी वहीं रखें।
7. पीठ देवता एवं द्वार पूजन:
गृहद्वारे - द्वारश्रियै नमः, नन्दायै नमः, सुनन्दायै नमः, धात्र्यै नमः, विद्यायै नमः।
उत्तरद्वारे - द्वारश्रियै नमः, बलाय नमः, प्रबलाय नमः।
पश्चिमद्वारे - द्वारश्रियै नमः, महाबलाय नमः, प्रबलाय नमः।
पीठमध्ये - वास्तुपुरुषाय नमः, मण्डूकाय नमः, कूर्माय नमः, पृथिव्यै नमः, अनन्ताय नमः, पद्माय नमः, सूर्याय नमः, चन्द्राय नमः, विष्णवे नमः।
8. प्राण-प्रतिष्ठा एवं आवाहन:
हाथ में अक्षत लेकर अनंत भगवान की प्रतिमा व अनंत सूत्र पर छोड़ते हुए आवाहन करें।
9. षोडशोपचार/पंचोपचार पूजन:
आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन कराएं।
अर्घ्य मंत्र:
अनन्तानन्त देवेश अनन्तफलदायक।
अनन्तानन्तरूपोऽसि गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥

आचमन मंत्र:
गङ्गोदकं समानीतं सुवर्णकलशे स्थितम्।
आचम्यतां हृषीकेश प्रसीद पुरुषोत्तम॥

स्नान मंत्र:
अनन्तगुणरूपाय विश्वरूपधराय च।
नमो महात्मदेवाय अनन्ताय नमो नमः॥

पंचामृत स्नान मंत्र:
(क) दुग्ध स्नान:
सुरभेस्तु समुत्पन्नं देवानाम् अपि दुर्लभम्।
पयो ददामि देवेश स्नानाथं प्रतिगृह्यताम्॥

(ख) दधि स्नान:
चन्द्रमण्डलसंकाशं सर्वदेवप्रियं हि यत्।
ददामि दधि देवेश स्नानाथं प्रतिगृह्यताम्॥

(ग) घृत स्नान:
आज्यं सुराणामाहारम् आज्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।
आज्यं पवित्रं परमं स्नानाथं प्रतिगृह्यताम्॥

(घ) मधु स्नान:
सर्वौषधिसमुत्पन्नं पीयूषसदृशं मधु।
स्नानाय ते मया दत्तं गृहाण परमेश्वर॥

(ङ) शर्करा स्नान:
इक्षुदण्डात्समुद्भूता शर्करा पुष्टिदा शुभा।
स्नानाय ते मया दत्ता गृहाण परमेश्वर॥

(च) शुद्धोदक स्नान:
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि स्नानाथं प्रतिगृह्यताम्॥

वस्त्र, उपवस्त्र (मौली), यज्ञोपवीत, चन्दन, अक्षत, पुष्पमाला अर्पित करें।
14 प्रकार के पत्र एवं पुष्प अर्पित करें।
ग्रन्थि (गांठ) पूजन करें: 14 गांठों पर एक-एक करके अक्षत-पुष्प चढ़ाएं।
【 भगवान अनंत के अष्टोत्तरशत (108) नाम 】
हाथ में अक्षत-पुष्प लेकर एक-एक नाम पर श्रीहरि को अर्पित करें:
ॐ अनन्ताय नमः
ॐ अच्युताय नमः
ॐ अद्भुतकर्मणे नमः
ॐ अमितविक्रमाय नमः
ॐ अपराजिताय नमः
ॐ अखण्डाय नमः
ॐ अग्नstrictlyनेत्राय नमः
ॐ अग्निवपुषे नमः
ॐ अदृश्याय नमः
ॐ अत्रिपुत्राय नमः
ॐ अनुकूलाय नमः
ॐ अमृताशनाय नमः
ॐ अनघाय नमः
ॐ अतिसुनीलाय नमः
ॐ अहराय नमः
ॐ अष्टमूर्तये नमः
ॐ अनिरुद्धाय नमः
ॐ अनिविष्टाय नमः
ॐ अचञ्चलाय नमः
ॐ अब्जाधिकाय नमः
ॐ अचलरूपाय नमः
ॐ अखिलाधाराय नमः
ॐ अव्यक्ताय नमः
ॐ अनुरूपाय नमः
ॐ अभयंकराय नमः
ॐ अक्षताय नमः
ॐ अवपुषे नमः
ॐ अयोनिजाय नमः
ॐ अरविन्दाक्षाय नमः
ॐ अशनवर्जिताय नमः
ॐ अधोक्षजाय नमः
ॐ अदितये नमः
ॐ अम्बिकापतिपूजिताय नमः
ॐ अपस्मारनाशनाय नमः
ॐ न्यायाय नमः
ॐ अनादये नमः
ॐ अप्रमेयाय नमः
ॐ अघहराय नमः
ॐ अमित्रघ्नाय नमः
ॐ अनीश्वराय नमः
ॐ अजाय नमः
ॐ अघोराय नमः
ॐ अनादिनिधनाय नमः
ॐ अमरप्रभवे नमः
ॐ अग्राह्याय नमः
ॐ अक्रूराय नमः
ॐ अनुत्तमाय नमः
ॐ अरूपाय नमः
ॐ अह्ने नमः
ॐ अमोघाधिपतये नमः
ॐ जयाय नमः
ॐ अक्षमाय नमः
ॐ अमृताय नमः
ॐ अमोघवीर्याय नमः
ॐ अव्यंगाय नमः
ॐ अविघ्नाय नमः
ॐ अतीन्द्रियाय नमः
ॐ अतितैजसाय नमः
ॐ अमितविक्रमाय नमः
ॐ अष्टमूर्तये नमः
ॐ अनिलाय नमः
ॐ अवशाय नमः
ॐ अणोरणीयसे नमः
ॐ अशोकाय नमः
ॐ अरविन्दाय नमः
ॐ अधिष्ठानाय नमः
ॐ अमितनयनाय नमः
ॐ अरण्यवासिने नमः
ॐ अप्रमत्ताय नमः
ॐ अनन्तरूपाय नमः
ॐ अनलाय नमः
ॐ आमिषाय नमः
ॐ हरिरूपाय नमः
ॐ अग्रगण्याय नमः
ॐ अपनेयाय नमः
ॐ अन्तकाय नमः
ॐ अचिन्त्याय नमः
ॐ अपान्निधये नमः
ॐ अरविन्दाय नमः
ॐ अमरप्रियाय नमः
ॐ अष्टसिद्धिदाय नमः
ॐ अरविन्दाय नमः
ॐ अनघाय नमः
ॐ आराध्याय नमः
ॐ अक्षोभ्याय नमः
ॐ अर्चिष्मते नमः
ॐ अनेकमूर्तये नमः
ॐ अनन्तब्रह्माण्डपतये नमः
ॐ ब्रह्माण्डनायकाय नमः
ॐ अनन्तशयनाय नमः
ॐ अमराधिपतये नमः
ॐ अनाधाराय नमः
ॐ अनन्तनाम्ने नमः
ॐ अनन्तश्रियै नमः
ॐ श्रीपतये नमः
ॐ अक्षराय नमः
ॐ आश्रमस्थाय नमः
ॐ आश्रमनीताय नमः
ॐ अन्नदाय नमः
ॐ आत्मयोनये नमः
ॐ अग्निपतये नमः
ॐ अवनिधराय नमः
ॐ अनादिने नमः
ॐ आदित्याय नमः
ॐ अमृताय नमः
ॐ अपवर्गप्रदाय नमः
ॐ अव्यक्ताय नमः
ॐ व्यक्ताय नमः
【 नैवेद्य, फल, ताम्बूल एवं आरती 】
धूप, दीप दिखाएं। नैवेद्य (मालपुआ व मिष्ठान्न) समर्पित करें। आचमन हेतु तीन बार जल दें।
फल समर्पण मंत्र:
इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव।
तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि॥

ताम्बूल (पान) समर्पण मंत्र:
पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्।
एलादिचूर्णसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्॥

दक्षिणा समर्पण मंत्र:
हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः।
अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥

अनंत व्रत की पौराणिक कथा का श्रवण अथवा वाचन करें।
आरती (कर्पूर जलाकर श्री जगदीश जी की आरती करें):
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय...
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...
दीनबन्धु दुःखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥ ॐ जय...
श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

प्रदक्षिणा मंत्र:
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणां पदे पदे॥

पुष्पाञ्जलि मंत्र:
नमस्ते भगवन् भूयो नमस्ते गरुडध्वज।
नमस्ते कमलाकान्त अनन्ताय नमो नमः॥

【 अनंत सूत्र (दोरक) धारण एवं विसर्जन विधि 】
1. दोरक प्रार्थना:
अनन्ताय नमस्तुभ्यं सहस्रशिरसे नमः।
नमोऽस्तु पद्मनाभाय नागानां पतये नमः॥

2. दोरक ग्रहण:
अनन्तकामदः कामाननन्तो मे प्रयच्छतु।
अनन्तदोररूपेण पुत्रपौत्राभिवृद्धये॥

3. दोरक बन्धन (पुरुष दाहिने हाथ में, स्त्री बाएं हाथ में बांधें):
अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नं समभ्युद्धर वासुदेव।
अनन्तरूपिन् विनियोजयस्व अनन्तसूत्राय नमो नमस्ते॥

4. पुरातन दोरक विसर्जन मंत्र:
नमः सर्वहितार्थाय जगदानन्दकारक।
जीर्णदोरकममुं देवं विसृजेऽहं त्वदाज्ञया॥

5. वायन (बायना) दान मंत्र:
गृहाणेदं द्विजश्रेष्ठ वायनं दक्षिणायुतम्।
त्वत्प्रसादादहं देव मुच्येयं कर्मबन्धनात्॥

प्रतिगृह्णीष्व विप्रर्षे अनन्तफलदायक।
पक्वान्नफलसंयुक्तं दक्षिणाघृतसंयुतम्।
वायनं द्विजवर्याय दास्यामि व्रतपूर्तये॥

6. पुरातन दोरक दान मंत्र:
अनन्तः प्रतिगृह्णाति अनन्तो वै ददाति च।
अनन्तस्तारकोभाभ्यामनन्ताय नमो नमः॥

इसके बाद यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराएं व दक्षिणा दें।
अंत में भगवान को पूजा समर्पित करें:
"अनेन कृतपूजनेन श्रीअनन्तदेवः प्रीयताम्, न मम।"

॥ इति श्री अनंत-पूजन विधानम् सम्पूर्णम् ॥
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