Doshi Chasma | दोषी चश्मा
| Author | B.P Koirala |
|---|---|
| Publisher | Sajha Prakasan (2010) |
| Categories | Nepali Novel |
| Languages | Nepali |
| File Size | 7.40 MB |
| Source / Credit | View Original |
Description
'दोषी चश्मा' (Doshi Chasma) नेपाली साहित्य की एक अत्यंत प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कहानी है, और इसी नाम से एक कहानी संग्रह भी है। इसके लेखक प्रसिद्ध नेपाली साहित्यकार और राजनेता विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला (बी.पी. कोइराला) हैं। नेपाली साहित्य के सुप्रसिद्ध फ्रायडवादी साहित्यकार विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला (बी.पी. कोइराला) द्वारा रचित 'दोषी चश्मा' एक कालजयी, चरित्रप्रधान और प्रतीकात्मक मनोवैज्ञानिक कहानी है। साझा प्रकाशन द्वारा विक्रम संवत २००६ में प्रकाशित इसी नाम के कथा-संग्रह में संकलित यह रचना नेपाली समाज की सामंती मानसिकता और चापलूसी (चाकरी) प्रथा का सूक्ष्म विश्लेषण करती है। कहानी का केंद्र बिंदु 'केशवराज' नामक एक साधारण कर्मचारी है। वह तत्कालीन राणाकालीन चाकरी प्रथा का शिकार है। केशवराज का पूरा जीवन 'जर्साब' ( उच्च अधिकारी ) को प्रसन्न करने, उन्हें समय पर प्रणाम करने और अपनी आजीविका बचाने के भय में ही बीतता है। कहानी में केशवराज का चेतन, अर्धचेतन और अवचेतन मन आपस में टकराते हैं। यद्यपि उसका चेतन मन जानता है कि इस जी-हुजूरी से उसका कोई भला नहीं हो रहा, फिर भी उसका अवचेतन मन दमित भय और हीनग्रंथि से इतना ग्रस्त है कि वह अपना आत्मसम्मान पूरी तरह खो बैठता है। कहानी का शीर्षक 'दोषी चश्मा' स्वयं में एक गहरा प्रतीक है, जो केशवराज के संकुचित और भ्रमित दृष्टिकोण को प्रकट करता है। कथाकार ने पात्र के आंतरिक द्वंद्व को व्यक्त करने के लिए कई प्रतीकों का प्रयोग किया है । चश्मा और तंग सुरवाल: कमरे में आकर चश्मे पर गुस्सा निकालना और पैर में फंसी तंग सुरवाल का न निकलना केशवराज के भीतर सुलगते मानसिक आक्रोश और कुंठा को दर्शाता है। धुएँ का गुबार: कमरे में फूटता धुएँ का डल्ला समस्याओं के क्षणिक समाधान का प्रतीक है। जब वह समझता है कि संकट टल गया तो प्रसन्न होता है, लेकिन कमरे का 'अंधेरा' यह संकेत देता है कि उसका भविष्य अभी भी अनिश्चित और अंधकारमय है।
खेतों की सुगंधित हवा: खेतों की हवा को स्वाद की तरह फेफड़ों में भरना यह दिखाता है कि पूरे दिन चाकरी में अपनी ऊर्जा नष्ट करने के बाद, आत्मनिर्भर न हो पाने के कारण वह विवशता में प्राकृतिक वातावरण से ही तुष्टि खोजने का प्रयास करता है। 'दोषी चश्मा' केवल एक मनोवैज्ञानिक कहानी नहीं है, बल्कि यह तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था पर करारा प्रहार है। चाकरी प्रथा व्यक्ति की मौलिक क्षमता, स्वाभिमान और श्रम को नष्ट कर देती है। केशवराज छोटी-छोटी घटनाओं को भी समस्या का पहाड़ मान लेता है और शंका-उपशंकाओं के जाल में उलझकर मानसिक रूप से अस्वस्थ हो जाता है। कथाकार बी.पी. कोइराला ने इस कहानी के माध्यम से हर मनुष्य के अस्तित्व, स्वाभिमान और आत्मगौरव की रक्षा का संदेश दिया है। वे दर्शाते हैं कि जब तक व्यक्ति अपने भीतर की कुंठाओं से बाहर निकलकर विकृत सामाजिक संस्कारों का विरोध नहीं करेगा, तब तक उसकी चेतना का विकास संभव नहीं है।
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