Sweet Sixteen in Hindi
| Author | Sudheer Mourya |
|---|---|
| Publisher | Read Publication (2017) |
| Categories | Hindi Novel |
| Languages | Hindi |
| File Size | 0.39 MB |
| Source / Credit | View Original |
Description
सुधीर मौर्य द्वारा लिखित हिंदी उपन्यास 'स्वीट सिक्सटीन' (Sweet Sixteen) आधुनिक हिंदी साहित्य में सामाजिक यथार्थवाद, वर्ग-भेद, और शोषित वर्ग के संघर्ष को रेखांकित करने वाली एक अत्यंत मार्मिक और विचारोत्तेजक कृति है । वर्ष 2017 में रीड पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित यह उपन्यास केवल एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह उच्च वर्ग के खोखलेपन, राजनीतिक रसूख के दुरुपयोग और हाशिए पर खड़े समाज की मजबूरियों को बेबाकी से उजागर करता है । उपन्यास की पृष्ठभूमि और शीर्षक की कहानीलेखक सुधीर मौर्य के अनुसार, इस उपन्यास की प्रेरणा उन्हें सोशल मीडिया पर एक महिला मित्र के साथ हुई चर्चा से मिली । उस मित्र ने उन्हें चुनौती दी थी कि क्या वे एक ऐसा उपन्यास लिख सकते हैं जिसका नायक 'दलित' समाज से हो । इस विचार पर काम करते हुए लेखक ने तीन महीने में यह उपन्यास पूरा किया । शुरुआत में लेखक ने इसका शीर्षक 'टूटते खंडहर' रखा था । परंतु, जब उन्होंने अपनी उस मित्र को पांडुलिपि पढ़ने के लिए भेजी, तो कहानी से प्रभावित होकर उन्होंने इसका नाम बदलकर 'स्वीट सिक्सटीन' करने का सुझाव दिया । यह शीर्षक कहानी में दो विरोधी छोरों को दर्शाता है—एक तरफ उच्च अभिजात वर्ग का अनैतिक जाल और दूसरी तरफ एक सोलह वर्षीय लड़की का पवित्र, बौद्धिक और क्रांतिकारी प्रेम । कुणाल ग्रामीण पृष्ठभूमि का एक सीधा-साधा दलित युवक है, जो शहर में बी.ए. प्रथम वर्ष की पढ़ाई करने आता है । उसके पिता एक क्षेत्रीय विधायक के यहाँ पुस्तैनी सेवक रहे हैं । विधायक की 'दरियादिली' और पिता के अनुरोध के कारण कुणाल को शहर के एक अति-सुरक्षित, वी.आई.पी. सरकारी आवासीय परिसर (VIP Residential Campus) में रहने के लिए एक फ्लैट मिल जाता है । इसी परिसर में कुणाल की दोस्ती दो आधुनिक, संभ्रांत और रईस घर की सोलह वर्षीय लड़कियों से होती है । संजू के पिता एक आई.ए.एस. (IAS) अधिकारी हैं और बंटी के पिता खुद एक रसूखदार विधायक हैं । ये दोनों लड़कियाँ कुणाल को अपनी ओर आकर्षित करती हैं और कुणाल भी रईसों के इस माहौल में खुद को उनके बराबर समझने के भ्रम (स्टेटस का फितूर) में आ जाता है । चक्रव्यूह और सामाजिक दलदलकहानी में मोड़ तब आता है जब नए साल की पूर्व संध्या (New Year's Eve) पर संजू और बंटी कुणाल को शहर से दूर एक आलीशान फार्म हाउस में 'रेव पार्टी' के लिए ले जाती हैं । वहाँ कुणाल का परिचय फार्म हाउस की मालकिन मिसेज रंजना और एक रईस महिला मिसेज अंजली से होता है । पार्टी के बाद कुणाल के पैरों तले ज़मीन तब खिसक जाती है, जब मिसेज रंजना उसे संजू और बंटी के साथ बिताए गए उसके अंतरंग पलों की गुप्त रूप से रिकॉर्ड की गई वीडियो (एमएमएस) दिखाती है । रंजना उसे झूठे बलात्कार के केस में फंसाकर जेल भेजने और सामाजिक रूप से बर्बाद करने की धमकी देती है । वास्तव में, संजू और बंटी भी इसी रंजना के हाई-सोसाइटी एस्कॉर्ट/देह-व्यापार के गिरोह का हिस्सा थीं, जो रईस और रसूखदार लोगों को लड़कियाँ और लड़के सप्लाई करती थी । कुणाल को मजबूरन मिसेज अंजली जैसी अमीर महिलाओं के लिए 'मेल गिगोलो' (Male Gigolo) बनना पड़ता है । इस दलदल में वह खुद को पूरी तरह असहाय और शोषित महसूस करता है । वह अपने माता-पिता और समाज से नज़रें मिलाने की हिम्मत खो देता है । लुबना (लवी)कुणाल की इस स्याह और नरक जैसी जिंदगी में लुबना (उर्फ लवी) एक मसीहा और मार्गदर्शक बनकर आती है । लवी इसी परिसर के सर्वेंट क्वार्टर ('C' ब्लॉक) में रहने वाले कुणाल के एक दूर के गरीब रिश्तेदार (सफाई कर्मचारी बृजलाल) के बच्चों को पढ़ाने आती है । वह स्वयं भी अपनी सोलहवीं वर्षगांठ मना रही एक बेहद खूबसूरत, हिजाब पहनने वाली मुस्लिम लड़की है, जो कला और साहित्य की गहरी समझ रखती है 。 लवी का चरित्र इस उपन्यास की आत्मा है । जब कुणाल अपनी वास्तविकता और मजबूरियाँ लवी के सामने रोते हुए बयां करता है, तो लवी उसे दुत्कारने के बजाय गले लगाती है । वह कुणाल के भीतर की हीनभावना को समझती है और उसके इस दलदल से बाहर निकलने के संघर्ष में उसकी सबसे बड़ी ताकत बनती है । लवी केवल एक प्रेमिका नहीं है; वह कुणाल को उसके 'शूद्र' और 'दलित' होने के सामाजिक दंश से उबरने के लिए इतिहास का पाठ पढ़ाती है । वह राजा सुदास और प्राचीन इतिहास के उदाहरण देकर समझाती है कि कैसे षड्यंत्रों के तहत एक गौरवशाली समाज को शिक्षा से वंचित कर पददलित किया गया । वह कुणाल के भीतर आत्मसम्मान और बराबरी के हक के लिए लड़ने की 'दृढ़ता' पैदा करती है । उपन्यास बेहद संजीदगी से यह दिखाता है कि कैसे समाज का शोषित वर्ग बड़े लोगों के 'जूठन' या अस्थाई आश्रय को ही अपनी तरक्की मान बैठता है और मूल अधिकारों की लड़ाई भूल जाता है । कुणाल का चरित्र इस हीनभावना और बाद में वैचारिक जागृति का प्रतीक है । संजू, बंटी, मिसेज रंजना और मिसेज अंजली के माध्यम से लेखक ने वी.आई.पी. संस्कृति, नौकरशाहों और राजनेताओं के घरों के भीतर छिपे नैतिक खोखलेपन और अपराध तंत्र पर करारा प्रहार किया है । जब कुणाल और उसके दोस्त विरेश इस अन्याय के खिलाफ पुलिस में आवाज़ उठाने की कोशिश करते हैं, तो पुलिस का संभ्रांत वर्ग के प्रति झुकाव और शोषितों पर होने वाला अत्याचार न्याय व्यवस्था की कमियों को उजागर करता है ।
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