महर्षि वाग्भट आयुर्वेद के इतिहास में सबसे प्रभावशाली चिकित्सकों और विद्वानों में से एक हैं। इन्हें महर्षि चरक और महर्षि सुश्रुत के साथ आयुर्वेद की "बृहत्त्रयी" (तीन महान संहिताओं) में गिना जाता है। इन्होंने चरक की चिकित्सा और सुश्रुत की शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के ज्ञान को मिलाकर एक सरल और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया।मुख्य रचनाएँ वाग्भट ने दो सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की, जो आज भी आयुर्वेदिक शिक्षा के मुख्य आधार स्तंभ हैं अष्टांग हृदयम: यह इनका सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय ग्रंथ है। इसे बहुत ही सुंदर और काव्यात्मक श्लोकों में लिखा गया है। आयुर्वेद के सिद्धांतों को आसानी से समझने के लिए आज भी इस पुस्तक का सबसे अधिक अध्ययन किया जाता है।अष्टांग संग्रह यह ग्रंथ थोड़ा अधिक विस्तृत है। इसमें गद्य और पद्य दोनों का मिश्रण है। इसमें अष्टांग हृदयम से अधिक विस्तार में विषयों को समझाया गया है।आयुर्वेद के आठ अंग (अष्टांग)अष्टांग का अर्थ है "आठ अंग"। वाग्भट ने अपने दोनों ग्रंथों में आयुर्वेद को निम्नलिखित आठ भागों में विभाजित किया है।